“आदमी तब तक देवता बना रहता है जब तक कुर्सी पर बैठा रहता है, कुर्सी गई नहीं कि देवत्व भी हवा हो जाता है।” — हरिशंकर परसाई
हमारे देश में दो चीज़ों की कद्र खूब होती है — एक, बाबाओं की और दूसरी, अफसरों की। अंतर केवल इतना है कि बाबा आश्रम में चमत्कार करता है और अफ़सर दफ़्तर में।
मैंने भी जब एक उत्तम दर्जे की कुर्सी संभाली थी, तो मेरे दफ़्तर का वातावरण किसी मिनी-आश्रम से कम नहीं था। भक्तों की रेलमपेल लगी रहती थी। पहले दरवाज़े को प्रणाम, फिर मेरी टेबल को प्रणाम और फिर मुझ त्रिकालदर्शी बाबा को साष्टांग दंडवत। एक क्षण को मुझे लगा कि शायद मेरी जन्मपत्री में कुछ विशेष था, शायद राहु-केतु ने भी मेरी कुंडली देखकर प्रणाम किया होगा कि ऐसा भक्तिवत्सल अफ़सर धरती पर कम ही पैदा होता है।
और श्रद्धा का आलम ये था कि जिन भक्तों की उम्र मुझसे दोगुनी थी, वे भी अपने कमर के ब्रेस और घुटनों की मर्यादा तोड़कर मेरे चरणों में गिरते थे। एक भक्त ने तो सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी — “हम तो बचपन से ही साथ पढ़े हैं, एक ही गुरुकुल (सरकारी स्कूल) में, क्लास फेलो थे!” मगर मैंने भी उस क्षण का लाभ उठाते हुए चुपचाप ‘अवॉर्ड फ़ॉर बेस्ट भक्ति अभिनय’ उनकी झोली में डाल दिया।
मेरे बारे में भक्तों ने इतने क़सीदे पढ़े कि लगता था किसी दिन मेरे नाम से च्यवनप्राश का विज्ञापन आ जाएगा —
“सुबह-सुबह अफ़सर जी का आशीर्वाद लीजिए, दिन भर ऊर्जा और पदोन्नति में तेज़ी।”
पर जैसे ही मैं रिटायर होकर वानप्रस्थ आश्रम पहुँचा, सब कुछ ऐसे बदल गया जैसे टॉकीज़ में अचानक बिजली चली जाए। बाबागिरी की पूरी फ़िल्म जैसे इंटरवल पर अटक गई हो और प्रोजेक्टर ऑपरेटर भाग गया हो।
जो कल तक मेरे दरवाज़े पर माथा टेकते थे, अब मुझे देखकर साइड हो लेते हैं कि वो देखो खरे आ रहा है चलो चलो कहीं कोई काम ना बता दे ? किसी समय परम भक्त रहे एक सज्जन जो मेरी बाबागिरी के दिनों में मेरे पैर sorry “चरण” ( पैर तो सामान्य लोगों के होते हैं , सिद्ध पुरुषों के तो चरण होते हैं) मेरे इतने चरण छुए कि उनकी भक्ति गिन्नीज बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो गई। पर मेरे वानप्रस्थ पाते ही वो चमत्कारी भक्त मेरे “पैरों” ( रिटायर्ड बाबा के चरण आटोमैटिकली पैरों में बदल जाते है) को इस दुख भरी दुनिया में अकेला छोड़कर अंतर्ध्यान हो गया। एक पार्टी में मेरा सामना होने पर उसने मुझे हेय दृष्टि से देखा और बड़े घमंड से अपना हाथ इस तुच्छ प्राणी से मिलाने के लिये बढ़ाया । उनकी दया देख मैंने मन में कहा “अबे रुलाएगा क्या” ? और पूरी श्रद्धा से उससे हाथ मिलाने की बजाए उसके हाथ जोड़ लिये।
परिवर्तन संसार का नियम है और मेरे रिटायरमेंट रूपी वानप्रस्थ के बाद कुछ अन्य अफ़सर “बाबा” का अवतार लेकर बहती गंगा की पवित्र कुर्सी पर आए और भक्त गण निष्ठा के नए नए चोले पहन कर उनकी पूजा करते रहे और उनको भी देवत्व का अनुभव करवाते रहे।
“भक्तों से घिरा आदमी कभी अपने आपको पहचान नहीं पाता, और जब पहचानता है तब तक पहचानने लायक कुछ बचा नहीं होता।” — हरिशंकर परसाई
वानप्रस्थ में मुझे दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ
हर वह व्यक्ति जो अपनी मीठी बातों से आपको डायबिटीज़ करा दे, ज़रूरी नहीं कि वो शुद्ध शक्कर हो, वो कैंसर वाला “शुगर फ्री” भी हो सकता है। कुछ लोगों की मुस्कान में इंसुलिन नहीं, इंटेंशन छुपा होता है। वो फूल और गुलदस्ते जो आपको मिलते हैं , वो दरअसल आपको नहीं आपकी कुर्सी को मिलते हैं। और जो लोग बार-बार आपके पैर छूकर आपको ‘देवत्व’ का भ्रम देते हैं, वो असल में आपके पावर का अंदाज़ा लगाकर अपनी उम्मीदों की टाइमिंग सेट कर रहे होते हैं।
सबसे बड़ी बात ये कि वानप्रस्थ के बाद अब जो लोग मुझसे मिलते हैं उनमें से अधिकतर वे ही हैं जिनका मैंने कभी कोई विशेष काम नहीं किया था। आश्चर्य तो तब हुआ जब एक दिन मुझसे मिलने वह व्यक्ति आया, जिसका मैंने कभी कोई काम नहीं किया था । वो मेरा धन्यवाद करने आया था कि सर अगर आपने उस समय मुझे नए चेलों में शुमार कर कुछ काम दे दिया होता तो मैं आज भी वहीं फँस कर संघर्ष करता रह जाता।आपकी दुत्कार ने मुझे अन्यत्र काम दिला दिया और मैं अब बड़ा आदमी बन गया हूँ। पहले तो मैंने खिड़की से झाँक कर उसकी मई चमचमाती गाड़ी देख उसके बड़े होने की विजुअल जाँच की, फिर सोचा मुझे तो पता ही नहीं था कि मेरी दुत्कार में इतना दम है। मैंने सोचा क्यों ना एक बार और दुत्कार कर इसे और बड़ा आदमी बना दूँ पर इतने में चाय आ गई और वो और बड़ा आदमी बनते बनते रह गया। वैसे जो लोग सच में स्नेह करते थे, उनका स्नेह बाबागिरी या वानप्रस्थ दोनों स्थितियों में समान बना रहा ।
तो भाइयों और बहनों,
अगर आप किसी कुर्सी पर हैं और भक्तों की भीड़ से घिरे हैं, तो समझ लीजिए कि आप ‘व्यक्ति’ नहीं, एक ‘पद’ हैं। जैसे ही पद गया, आप फिर वही होंगे जो थे — सिर्फ़ एक इंसान, न बाबा, न त्रिकालदर्शी, न देवता।
आज जब स्वार्थवश कोई मुझे प्रणाम नहीं करता, और मैं भी चैन से बैठकर चाय पीता हूं, तो लगता है असली मजा तो वानप्रस्थ में ही है। कम से कम अब कोई मेरा पैर छूकर मेरी जेब तक नहीं पहुंचता।
अब न कोई भक्त है, न कोई टेबल, बस एक चाय और अख़बार है। अब न किसी मीटिंग की चिंता है न विधानसभा प्रश्न की, समय ही समय है है परिवार के लिए, मस्ती के लिए और घूमने के लिए। परिवार, बच्चों और उनके बच्चों के साथ खुशियां मनाना, दोस्तों के साथ गीत संगीत की महफिल में कॉकटेल पार्टी करना, उनके साथ सपरिवार दुनिया घूमकर मज़े करना— यही असली मोक्ष है।”
और अंत में एक चेतावनी —
हे वर्तमान पदासीन अफ़सरों! हे अल्पकालिक बाबाओं!
अगर आप अभी किसी सुगंधित कुर्सी पर विराजमान हैं और आपके चारों ओर श्रद्धालु भक्तों की चहल-पहल है, तो कृपया सतर्क हो जाइए। यह चरण-वंदना, यह तिलक-युक्त शुभ प्रभात, और “सर, आप तो भगवान हैं” टाइप के संवाद… ये सब मोह-माया हैं।
याद रखिए, चरण छूने वाले स्वार्थी भक्त ही सबसे पहले आपकी पीठ में चाकू घोंपते हैं — वह भी फिल्मी बटन चक्कू जैसा।
इन श्रद्धा-सेवकों से अपनी रक्षा कीजिए।
भक्तों को पहचानिए — कौन वाक़ई स्नेह करता है और कौन आपकी फाइल की नोटिंग में पेमेंट या कांट्रैक्ट के रौशन भविष्य का दिया जलाए बैठा है।
और सबसे ज़रूरी बात,
रिटायरमेंट का मोक्ष तभी प्राप्त होता है जब आप समय रहते ‘देवत्व’ के भ्रम से मुक्त हो जाएं।
वरना अंत में जब कुर्सी जाएगी, तो बाबा नहीं भक्त अंतर्ध्यान हो जाऐंगे और आप सोचते रह जाएंगे कि हम इतना “बाबा-बाबा” सुनकर भी…
ना बाबा बन पाए, ना इंसान रह पाए।
भक्तों की भीड़ से थोड़ा दूर रहिए, वरना देवत्व के चक्कर में रिटायरमेंट का मोक्ष भी नहीं मिलेगा
और जब कुर्सी जाएगी, तब समझ में आएगा कि आप बाबा नहीं, बस कुर्सीधारी इंसान थे।
नोट:
इस व्यंग्य को पढ़कर अगर कोई भक्तगण आहत हो जाएं तो समझ लीजिए कि वाकई वो भक्त नहीं, व्यवसायी थे।
– राजीव खरे
(पूर्व कुर्सीधारी, स्वघोषित रिटायर्ड बाबा, वर्तमान यथार्थवादी)

