“वोट से पहले वादा, वादे से पहले स्कीम, और स्कीम से पहले बैंक खाता — यही है नएभारत का विकास–क्रम।” लोकतंत्र में जनता को सबसे बड़ी शक्ति कहा गया है। पर आधुनिक लोकतंत्र ने इसे थोड़ा संशोधित कर दिया है — अब जनता की ताक़त उसके वोट में नहीं, उसके बैंक खाते में आने वाले ट्रांज़ैक्शन मैसेज में है।
हर चुनावी मौसम में यह संदेश ऐसे बरसता है मानो विकास की गंगा बह निकली हो। बिहार में इस बार फिर वही कहानी — स्कीमों की बाढ़, वादों की झड़ी, और वोटों की खेती का उत्सव।
चुनाव आते ही देश के नेताओं का दिल कुछ ऐसा पिघलता है जैसे जून में आइसक्रीम। बिहार में हाल ही में प्रधानमंत्री जी ने लाखों महिलाओं को ₹10,000 की सौगात देने की घोषणा की। कारण बताया गया — “महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना।” सुनकर हर पति मुस्कराया, फिर थोड़ा चिंतित हुआ। सोचा – अगर आत्मनिर्भर हो गईं, तो हमारा क्या होगा?
जनता अब समझदार है। उसे मालूम है कि बरसात से पहले मानसून आता है, और चुनाव से पहले “स्कीम–मानसून।” कोई सिलाई मशीन देता है, कोई स्कूटी, कोई सिलेंडर, और अब तो ऐप भी।बस अफसोस यह कि ऐप चलता तभी है जब टॉवर हो —जो चुनाव खत्म होते ही गायब हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे उम्मीदवार का स्थानीय प्रेम।
दिल्ली से लेकर पटना तक, अब राजनीति का नया विषय “रेवड़ी” है। केजरीवाल जी इस फील्ड के प्रोफेसर हैं। उनका फॉर्मूला साफ़ है — बिजली मुफ़्त, पानी मुफ़्त, बस की सवारी मुफ़्त — पर वोट की गारंटी ज़रूरी।”
बाक़ी दलों ने भी यह ‘सफल मॉडल’ अपनाया है।
BJP कहती है — “हम देंगे, पर राष्ट्रहित में देंगे।”
कांग्रेस कहती है — “हमने तो सत्तर साल से यही किया है।”
RJD कहती है — “हमारे लिए तो ये परंपरा है।”
और जनता कहती है — “सब देंगे तो सबका स्वागत है।”
अब चुनाव प्रचार के नारे कुछ यूँ हो गए हैं — “हर हाथ में मोबाइल, हर खाते में पैसा।”
विकास की परिभाषा भी बदल चुकी है —अब सड़क, स्कूल या अस्पताल नहीं, ‘डायरेक्टबेनिफिट ट्रांसफर’ से विकास मापा जाता है। सरकार कहती है — “अब हम सीधे खाते में डालेंगे।” जनता सोचती है — “कम से कम अब बिचौलिया नहीं मांगेगा।”पर सच्चाई यह है कि बिचौलिया अब सिस्टम में ही सेट हो चुका है।
पहले नेता अस्पताल का उद्घाटन करते थे, अब कहते हैं — “हर मां के खाते में ₹500, ताकि बच्चे का भविष्य उज्जवल बने।” भविष्य उज्जवल बने न बने, पर मोबाइल रिचार्ज ज़रूर हो जाता है।
महिलाएं कहती हैं — “नेता जी हमारे बारे में सोचते हैं।” पुरुष कहते हैं — “सोचते हैं, पर हमारे लिए कुछ नहीं करते।” और बच्चे कहते हैं — “पापा, अगली बार मम्मी को ही वोट देना।”
आज लोकतंत्र का असली सौंदर्य यही है नेता कहते हैं, “हम देंगे।”जनता कहती है, “तो हम भी देंगे।” फर्क बस इतना कि नेता वादे देते हैं, जनता वोट देती है, और बाद में दोनों को अहसास होता है कि किसी ने किसी को ज़रूर बेवकूफ़ बनाया है।
रेवड़ी अब धर्मनिरपेक्ष हो चुकी है — कभी भगवा, कभी हरी, कभी लाल — स्वाद सबका एक ही है: मीठा और क्षणिक। अब विकास योजनाओं की जगह वोट योजनाएं चल रही हैं।
हर पार्टी जनता की “आर्थिक चिंता” में डूबी है — बस फर्क यह कि चिंता खत्म होते ही चुनाव भी खत्म हो जाता है। मुफ़्तख़ोरी अब राष्ट्रनिर्माण का नया मॉडल बन चुकी है। जहां राष्ट्रनिर्माण की परिभाषा यह है —“जनता को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पहले उसे निर्भर बना दो।” और जब तक जनता को “मुफ़्त” मिलता रहेगा,नेता “मुक्त” रहेंगे — जवाबदेही से।
“हमारे यहां नीति नहीं, नक़दी बनती है — और नक़दी भी वही जो चुनावी मौसम में पकीहो।”
( रोज़ चुनाव की तमन्ना मन में लिए रेवड़ी की आस में बैठा एक वोटर)

