भारतीय प्रशासनिक सेवा कभी “स्टील फ्रेम” कहलाती थी। आज हालत यह है कि यह फ्रेम स्टील से रबर बन चुका है—झुकने में निपुण, खिंचने में माहिर और समय आने पर छुट्टी लेकर खिसकने में एक्सपर्ट।
प्रदेश के हालिया मुख्य सचिव महोदय रिटायर हुए (नाम की ज़रूरत ही कहाँ है, काम ही पहचान है!) इसी अद्भुत परंपरा के “जीवित स्मारक” रहे।
*एक पंख से उड़ने वाला तोता*
मुख्य सचिव का पद कोई शो-पीस नहीं होता। यह प्रशासनिक प्रमुख का पद होता है—लेकिन हमारे महोदय इसे “ornamental chair” ही समझते रहे। कहते हैं, वे इतने दूरदर्शी थे कि किसी भी महत्वपूर्ण फाइल पर साइन ही नहीं करते थे। कारण? साइन करेंगे तो जवाबदेह भी होना पड़ेगा! और जवाबदेही जैसी फालतू चीज़ों से दूर रहना ही तो बुद्धिमानी है।
जब भी कोई क्रिटिकल मामला सामने आता, साहब छुट्टी पर निकल पड़ते। जैसे बच्चे गणित की परीक्षा वाले दिन अचानक बीमार पड़ जाते हैं।
*भ्रष्टाचार के स्वर्णिम अध्याय*
उनके कार्यकाल में प्रदेश में भ्रष्टाचार इतना बढ़ा कि लोग कहने लगे—
“जब प्रशासन की आँख बंद हो तो , तो डर काहे का?”
• अधिकारी जेल गए।
• कर्मचारी जेल गए।
• ईडी, सीबीआई, आयकर विभाग ने घर-घर दस्तक दी।
लेकिन मुख्य सचिव साहब? वो तो सुरक्षित रहे। मानो शासन-प्रशासन की गंगा बह रही हो और साहब केवल तख्ती लेकर किनारे बैठे हों—“गंगा स्नान बाद में, अभी छुट्टी पे हूँ।”
*सिस्टम की आत्मकथा*
एक समय था जब आईएएस अफ़सर को जनता की सेवा का प्रतीक माना जाता था। अब वही आईएएस, नेता और अफ़सर की संयुक्त कंपनी बन चुके हैं।
• नेता कहते हैं—“आप बस हमारी हाँ में हाँ मिलाइए।”
• अफ़सर कहते हैं—“आप बस हमें पोस्टिंग और एक्सटेंशन दिलाइए।”
• जनता कहती है—“हमें तो बस बताइए कि रिश्वत कहाँ देना है।”
और यह गठजोड़ चलता रहा।
*सेवा या सेवादारी?*
आईएएस सर्विस बनाई गई थी ताकि यह लोकतंत्र का स्टील फ्रेम बने। लेकिन आज यह “पॉलिटिकल वेटर सर्विस” बन गई है। प्लेट में योजनाएँ परोस दी जाती हैं, बजट की मिठाई बाँट दी जाती है और जनता को बस “रेत के पेड़े” खाने को मिलते हैं।
हमारे हालिया मुख्य सचिव महोदय इस कला में इतने माहिर थे कि अब शायद उन्हें रिटायरमेंट के बाद भी किसी नई कुर्सी से नवाज़ा जाए। आखिर “ऐड़ा बनकर पेड़ा खाने” की प्रतिभा किसी-किसी के पास होती है।
**व्यंग्य का निष्कर्ष **
जिस तरह मनमोहन सिंह ईमानदार थे लेकिन उनकी सरकार भ्रष्टाचार में डूबी रही, उसी तरह हमारे मुख्य सचिव महोदय भले ही “फाइल पर साइन न करने” की ईमानदारी निभाते रहे, लेकिन उनके कार्यकाल में भ्रष्टाचार का सैलाब उमड़ता रहा।
उनका योगदान प्रदेश के लिए यही रहा कि—
• प्रशासनिक जवाबदेही को “छुट्टी” पर भेजा।
• मुख्य सचिव के पद को “रबर स्टैम्प” बना दिया।
• और जनता को समझा दिया कि असली ताक़त अब सिस्टम की विफलता में ही छुपी है।
इतिहास उन्हें “भ्रष्टतम नौकरशाही के निकम्मे कप्तान” के रूप में याद रखेगा।
या फिर, व्यंग्य की भाषा में कहें तो—
“एक पंख से उड़ने वाले तोते” की तरह, जिनकी उड़ान बस दिखाने भर की थी।
**(एक व्यंग्यकार जो ख़तरा भाँप कर मुख्य सचिव की तरह छुट्टी में है) **

