राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ताज़ा रिपोर्ट ने देश के सामने एक असहज सच्चाई रख दी है। छत्तीसगढ़ में बुज़ुर्गों की हत्या की दर पूरे भारत में सबसे ज़्यादा है। यह आंकड़ा न सिर्फ़ पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठाता है, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदनाओं की पोल भी खोलता है।

सोचिए, जिन बुज़ुर्गों ने अपनी ज़िंदगी परिवार, समाज और देश को समर्पित कर दी, वही आज सबसे असुरक्षित हैं। NCRB के अनुसार 2023 में 72 घटनाओं में 73 बुज़ुर्गों की हत्या हुई। यह सिर्फ़ गिनती नहीं, बल्कि उन परिवारों की तबाही का दस्तावेज़ है, जिनके घरों से बड़ों का साया अचानक उठ गया।
*अकेलापन और संपत्ति विवाद – सबसे बड़ी वजह*
ग्रामीण और शहरी, दोनों ही इलाकों में बुज़ुर्गों के खिलाफ़ अपराध तेज़ी से बढ़ रहे हैं।
• कहीं अकेलेपन का शिकार बुज़ुर्ग अपराधियों के आसान निशाने बनते हैं।
• कहीं संपत्ति विवाद उनकी जान ले लेता है।
• तो कहीं घरेलू तनाव और उपेक्षा, हिंसक रूप में सामने आती है।
छत्तीसगढ़ जैसे संसाधन-संपन्न राज्य में अगर बुज़ुर्ग सुरक्षा की स्थिति इतनी भयावह है, तो यह पूरे देश के लिए चेतावनी है।
*न्याय और पुलिस – दोनों की परीक्षा*
रिपोर्ट कहती है कि 2023 में कुल 1,798 अपराध बुज़ुर्गों के खिलाफ़ दर्ज किए गए। लेकिन विडंबना यह है कि इतनी बड़ी संख्या में गिरफ्तारी और चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद केवल 235 आरोपियों को ही दोषी ठहराया गया। अदालतों की सुस्ती और प्रक्रियाओं का बोझ, न्याय को मज़ाक बना देता है।
क्या पुलिस और न्यायपालिका सिर्फ़ आंकड़े गिनने के लिए रह गई हैं? अपराध रोकने और अपराधियों को सज़ा दिलाने की गति इतनी धीमी क्यों है?
*समाज की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी*
सवाल सिर्फ़ सरकार या पुलिस पर नहीं है।
• क्या समाज ने अपने बुज़ुर्गों को अकेला छोड़ दिया है?
• क्या हम उन्हें “बोझ” मानने लगे हैं?
• क्या आधुनिक जीवनशैली ने हमें इतना संवेदनहीन बना दिया है कि बुढ़ापे को सुरक्षा की जगह भय का दौर बना दिया है?
*समाधान की दिशा*
इस संकट से निकलने का रास्ता कई स्तरों पर बनाना होगा।
• सरकार को “वरिष्ठ नागरिक सुरक्षा अभियान” चलाना चाहिए।
• हर थाने में सीनियर सिटीजन डेस्क होनी चाहिए।
• समाज स्तर पर पड़ोस निगरानी और सामुदायिक सुरक्षा तंत्र सक्रिय होना चाहिए।
• अदालतों में ऐसे मामलों के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट हों।
अगर ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में बुज़ुर्गों की हत्या और शोषण की ये घटनाएँ सिर्फ़ अख़बार की सुर्ख़ियाँ नहीं रहेंगी, बल्कि सामाजिक पतन का प्रमाण बन जाएँगी।
बुज़ुर्गों की सुरक्षा का सवाल केवल क़ानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि हमारे मानव होने की पहचान का सवाल है।
( *राजीव खरे- ब्यूरो चीफ छत्तीसगढ़*)

