कुत्ते कॉलोनी के, ज़िम्मेदार कोई नहीं
शहरों की पाश कालोनियों में कुत्ते पालना अब जीवनशैली नहीं, स्टेटस सिंबल बन चुका है। जितना महंगा कुत्ता, उतनी बड़ी सोशल वैल्यू। सुबह-सुबह लहराते गॉगल्स, हाथ में डॉग-लीश और कान में एयरपॉड्स — ये नया “कुत्ता-प्रेमी योग” है।
लेकिन कुत्ते का प्रेम वहीं तक सीमित है जहाँ तक वो किसी और की गाड़ी के टायर पर सूसू न करे, किसी बच्चे को काट न ले, और पार्क को अपनी पर्सनल टॉयलेट न समझे।
पर अफसोस, यही तीनों काम सबसे पहले होते हैं।
मालिक कहता है — “टॉमी तो बहुत स्नेही है, सिर्फ़ सूंघ रहा था।”
अरे भाई, बच्चे का हाथ अब सूजा हुआ है —
सूंघा नहीं, चखा है उसने!
पॉश कॉलोनियाँ कभी अमन, सफाई और सलीके का प्रतीक मानी जाती थीं। आज वही कॉलोनियाँ एक अजीब तरह की श्वान-सत्ता के अधीन हैं। यहाँ इंसान अपनी सुरक्षा के लिए गेट से बाहर सोच-समझकर निकलता है, और कुत्ता बिना रजिस्ट्रेशन, टैक्स और अनुशासन के पूरी कॉलोनी का राजा बना बैठा है।
अब हर सुबह एक दृश्य आम है — कोई बुज़ुर्ग छड़ी टेकते हुए पार्क के कोने में सहमे खड़ा है, कुछ बच्चे गार्ड से पूछ रहे हैं, “वो भूरा वाला कुत्ता आज उधर तो नहीं है ना?”, और एक महिला अपने छोटे पालतू को खींच रही है जो पार्क की हर झाड़ी को अपनी ‘साम्राज्य सीमा’ घोषित कर रहा है। पीछे बोर्ड टंगा है — “NO POOP ZONE”, पर ज़मीन पर गवाही कुछ और ही बयाँ कर रही है।
“नो पूप ज़ोन” सिर्फ़ बोर्ड तक सीमित है
पार्कों में अब फूलों से ज़्यादा गंदगी का डर है। हर दो कदम पर आपको एक ताज़ा गारंटी मिलती है कि यहां टॉमी-शेरा-लैसी जैसे किसी ने नैतिक शौच क्रिया सम्पन्न की है।
बोर्ड लगे हैं, कहते हैं — “डॉग ओनर, प्लीज़ क्लीन अप।”
लेकिन असल में होता क्या है?
मालिक मोबाइल में Instagram Reel देख रहा होता है,
और कुत्ता कॉलोनी की घास को उर्वरक बना रहा होता है।
और जब कोई रेजिडेंट विरोध करे तो सुनिए प्रतिक्रिया —
“इतना भी क्या हुआ जी, जानवर है, गंदगी तो करेंगे ही!”
तो क्या इंसान जानवर से हार गया?
क्या सफाई अब सिर्फ़ झाड़ू वालों की ज़िम्मेदारी है?
बच्चे-बुज़ुर्ग अब ‘ट्रेनिंग डमी’ हैं
आजकल हर कॉलोनी में पालतू कुत्तों द्वारा किसी बच्चे के काटे जाने की खबर आती है। कई बार ये ‘प्यारे पालतू’ किसी बुज़ुर्ग को गिरा देते हैं।
और जवाब?
“वो तो बहुत फ्रेंडली है जी, बस खेल रहा था।”
कभी-कभी तो इन ‘प्रेमी मालिकों’ के लिए
इंसान की खाल से ज़्यादा, कुत्ते की फीलिंग्स ज़रूरी होती है।
नोएडा, गुरुग्राम जैसी जगहों पर
पिटबुल, डॉबरमैन, और जर्मन शेफर्ड जैसे
आक्रामक नस्लों के हमले जानलेवा बन चुके हैं। रायपुर भी इन जगहों को टक्कर देने की तैयारी पर है।
लेकिन आज भी रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन की बैठकों में इन मुद्दों पर चर्चा होते ही माहौल गरमा जाता है
आवारा कुत्ते: जो आपके नहीं हैं, लेकिन आपके ही सिर पर हैं
एक तरफ पालतू ख़ानदानी कुत्ते हैं,
तो दूसरी ओर हैं कॉलोनी के किनारे पलते रोडेशियन ,
जिन्हें कोई नहीं पालता, पर वे सब पर राज करते हैं।
निर्माणाधीन मकानों में, जहाँ न कोई गार्ड है न रौशनी —
वहाँ ये झुंड जमा होता है।
दिन में वो छाया में आराम फरमाते हैं,
और रात को डिलिवरी बॉय, वॉचमैन ,दुपहिया चालकों और घूमने वालों की “कॉम्बैट ट्रेनिंग” लेते हैं।
कई जगह तो कॉलोनियों के प्रवेश द्वार पर
इन आवारा कुत्तों ने स्थायी अड्डा बना लिया है।
अगर आप गाड़ी से हैं, तो सलामत हैं।
अगर पैदल चल रहे हैं, तो “भगवान का नाम लेकर जाइए”।
कानून कब बोलेगा? या हम डर से ही जीते रहेंगे?
IPC की धारा 302 (हत्या) के तहत
यदि कोई इंसान किसी की जान ले, तो वह दोषी है।
पर अगर किसी पालतू कुत्ते ने हमला कर
किसी को अपाहिज कर दिया या जान ले ली — तो उसका मालिक क्या सिर्फ़ “माफ़ी” से बच सकता है?
जानवर की रक्षा ज़रूरी है,
लेकिन इंसान की जान की कोई कीमत नहीं?
जो लोग पालतू कुत्ता पालते हैं,
उनसे समाज को प्रेम के साथ ज़िम्मेदारी भी चाहिए।
कुत्ता पालिए, प्यार दीजिए, लेकिन उसे कॉलोनी पर न थोपिए
समाधान? हाँ, पर आँखें खोलने की ज़रूरत है
•कॉलोनी में पंजीकरण रहित कुत्तों पर प्रतिबंध हो
•पालतू कुत्तों के लिए बांधना, सफाई करना और कंट्रोल में रखना अनिवार्य हो
•“नो पूप ज़ोन” को “नो टॉलरेंस ज़ोन” बनाया जाए
•कुत्तों के काटने पर मालिकों पर कानूनी कार्रवाई हो
•और सबसे ज़रूरी —
समाज प्रेम और ज़िम्मेदारी में फर्क समझे।
अंत में — प्रेम दिखाने से पहले सुरक्षा की सोचिए
जब अगली बार कोई कुत्ता किसी बच्चे की तरफ दौड़े,
या किसी बुज़ुर्ग की चाल बिगाड़े,
या कॉलोनी की घास पर राजशाही मल-त्याग करे
तो प्यार दिखाने से पहले ज़िम्मेदारी उठाइए।
कुत्ता पालना अपराध नहीं,
लेकिन उसे बेकाबू छोड़ देना सामाजिक अपराध है।
( राजीव खरे -एक पाश कॉलोनी का रेज़िडेंट, जिसने कुत्तों के डर से कालोनी में पैदल घूमना छोड़ दिया है)

