एक दिन मैं अपनी कॉलोनी से बाहर निकल रहा था। जैसे ही गाड़ी चालू की, अचानक फोन आ गया। आदत के मुताबिक़ मैंने गाड़ी की खिड़की खोलकर बात शुरू की ही थी कि तभी एक गाय ने बड़ी आत्मीयता से अपना मुख मेरी कार की खिड़की में डाल दिया। मेरी आँखों में आँखें डालकर उसने पूछा—
“आज गुरुवार है… बेसन के लड्डू लाए हो या फिर फोन पर ही घुमाते रहोगे?”
मैं कुछ कहता, उससे पहले ही अपराधबोध से भर गया। सिर झुकाकर बोला—
“माफ करिएगा माता, बाज़ार जा ही रहा था… लड्डू तो रह ही गए…”
गौमाता ने मुंह फेर लिया और अनुग्रह की जगह उपेक्षा का भाव लिए आगे बढ़ गईं।
थोड़ा सकपकाकर मैंने रास्ता बदला और कॉलोनी के दूसरे गेट से निकलने का प्रयास किया। मगर वहां तो déjà vu हो गया। वही फोन, वही खिड़की, और वही गौमाता—इस बार नई थीं मगर नीयत वही।
“आज शुक्रवार है। खीर तो बनाई होगी न?”
मैंने फिर सिर झुका लिया। गौमाता वहां से चली गईं। मैं शर्मिंदा, गाड़ी लेकर पतली गली से निकल गया।
पॉश कॉलोनियों का नया धार्मिक स्थल
दरअसल, यह कोई असाधारण घटना नहीं है। आजकल हर संभ्रांत कॉलोनी के बाहर ये दृश्य आम हैं — रोटियाँ, गुड़, बेसन, खीर, पालक, सत्तू और भक्तों की अनवरत सेवा। लोग SUV में बैठकर खिड़की खोलते हैं और एक भक्तिभाव से गायों को खिलाते हैं। नज़ारा कुछ यूँ लगता है मानो कोई पाँच सितारा “Drive-Through गौसेवा केंद्र” खुल गया हो।
गौमाता भी अपने “फ़िक्स टाइम स्लॉट” में हाज़िरी लगाती हैं। उन्हें पता है किस कार से बूँदी आएगी, किससे गुड़ की रोटी, और किससे ‘ऑर्गेनिक पालक’।
गायों की संघर्ष गाथा
परंतु यह श्रद्धा भी कभी-कभी दुधारी तलवार बन जाती है। जैसे ही किसी एक कार से बेसन की खुशबू आती है, बाकी गायें वहाँ दौड़ पड़ती हैं — और शुरू हो जाती है “गौ माताओं की जंग”। सींग-से-सींग टकराते हैं, भक्तजन चुपचाप खिड़की बंद कर लेते हैं और मोबाइल से वीडियो बनाते हैं। कभी-कभी यह युद्ध दुपहिया वाहन चालकों पर आकर टूटता है।
बाइक वाला लड़खड़ा जाता है, और पीछे से आवाज़ आती है —
“अरे देख नहीं सकते? गौसेवा चल रही है!”
पुण्य बनाम व्यवस्था
गौमाता का पवित्र गोबर कॉलोनी की एंट्री पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है — गंध, गीलापन और चप्पल फिसलने के डर के साथ। परंतु भक्तगण इससे विचलित नहीं होते।
“यह गंदगी नहीं, पुण्य का प्रमाण है”, ऐसा मानकर वो खिड़की से चारा बढ़ाते रहते हैं।
लेकिन असली परीक्षा तब आती है जब कोई गौमाता किसी वाहन की टक्कर से दिवंगत हो जाती हैं।
अब न कोई रोटी, न लड्डू… न ही फोन कॉल।
सड़क किनारे पड़ा मृत शरीर धीरे-धीरे सामाजिक अनदेखी का शिकार बनता है।
फिर वही भक्तगण जो रोज़ाना खीर परोसते थे, अब कहते हैं —
“बड़ी बदबू आ रही है… दूसरा गेट पकड़ो यार।”
और नगर निगम को फोन करने की बजाय, WhatsApp ग्रुप पर एक भावुक संदेश भेज दिया जाता है:
“गौमाता हमें देख रही हैं, सेवा का अवसर लें!”
सेवा या सुविधा?
गौसेवा में भाव हो तो वह तप बनती है, दिखावा हो तो नाटक। सेवा का अर्थ केवल भोजन देना नहीं, संपूर्ण उत्तरदायित्व लेना है — बीमार होने पर देखभाल, घायल होने पर उपचार, और मृत्यु पर सम्मानजनक अंत।
गौमाता भोजन मांगती हैं, मगर उससे भी ज़्यादा इंसानियत की स्थायी भूख रखती हैं।
शायद अगली बार जब कोई गौमाता खिड़की से झाँके तो वह पूछे—
“बेटा, सेवा कर रहे हो या सिर्फ स्टोरी पोस्ट कर रहे हो?”
🙏 जय गौमाता, जय हो।
( एक डरपोक व्यंगकार जो गौ सेवकों से पिटने के डर से अपना नाम छुपा रहा है)

