भुट्टावादी युग में प्रवेश — जब स्वाद बचपन से पीछा करता है
जिस दौर में लोग स्टॉक मार्केट और स्टोरी स्टेटस के भाव में उलझे रहते हैं, उसी दौर में बारिश की पहली बूँद के साथ हमारी चेतना के भीतर एक पुराना, भुट्टेदार स्मृति-कोष खुल जाता है — जिसमें पॉलिटिकल एजेंडा नहीं, भुट्टा-चोरी एजेंडा होता है।
हाँ साहब, भुट्टा आज भले ही कार की विंडस्क्रीन पर दस्तक दे रहा हो, लेकिन एक ज़माना था जब हम लोग दूसरों के खेतों और बग़ीचों में घुसकर खुद उसकी जड़ों से रिश्ता जोड़ा करते थे — वो भी बिना स्वीकृति।
भुट्टे की चोरी: एक बाल-क्रांति आंदोलन
वो दिन जब बारिश की पहली फुहार के बाद स्कूल से लौटते ही हम आधी पैंट में टोली बनाकर निकल पड़ते थे
लक्ष्य: शर्मा जी का खेत
योजना: बाड़ के पीछे से अंदर घुसना
जोखिम: चौकीदार और उसका डंडा
इनाम: गरम, दूधिया भुट्टा
हमारे पास कोई हथियार नहीं होता था, बस एक प्लान होता था —
“तू पहरा दे, मैं तोड़ता हूँ, तू पत्ते छीलना शुरू कर…”
और जैसे ही पहला भुट्टा हाथ में आता —
“अबे भाग! चौकीदार आ गया!”
चौकीदार, जिसने ज़िंदगी में कभी मैराथन नहीं दौड़ी, उस दिन हुसैन बोल्ट बन जाता था —
और हम लोग, भीगे हुए, भुट्टे छाती से चिपकाए, जान बचाकर झाड़ियों में घुस जाते थे।
भुट्टा पकाना: विज्ञान और जुगाड़ का संगम
उसके बाद शुरू होती थी विज्ञान की प्रयोगशाला –
भीगी लकड़ी, पुराने टायर की रबर, और माचिस की आधी गीली तीली से आग जलाना।
और फिर वो ‘चिट-चिट’ की आवाज़ —
कोई बोले तो बोले, पर हम जानते थे कि दाने फटने लगे हैं, यानी स्वाद पनप रहा है।
नमक न हो, तो मिर्ची से काम चलाते थे।
नींबू न हो, तो सामने वाला खट्टा मुँह बनाकर खड़ा हो जाता था —
“देख, ये खा, खट्टा चेहरा बना रहा हूँ, यही नींबू मान ले।”
अब वो चोर बच्चे कार में बैठे उपभोक्ता हैं
अब वही बच्चे बड़े हो गए हैं। कार में बैठे हैं।
भुट्टा ख़रीदते हैं।
नाप-तौलकर कहते हैं — “थोड़ा मीडियम रोस्टेड, ज्यादा बर्न्ट नहीं चाहिए।”
अरे! वही तुम थे जो कभी खेत में भुट्टा तोड़कर चौकीदार से बचते हुए नींबू की जगह पसीना लगाकर खाते थे।
अब तुम्हारी जेब में वॉलेट है, कार्ड है, पेटीएम है —
लेकिन वो अपराधबोध में लिपटी स्वाद की खुशी, अब बस यादों में ही मिलती है।
भुट्टा अब सिर्फ स्वाद नहीं, एक कालखंड है।
उस भुट्टे में उस समय की ख़ुशबू है,
जहाँ चोरी करना अपराध नहीं, अनुभव था,
जहाँ डाँट खाने के बाद भी हम मुस्कुराते थे,
क्योंकि भुट्टा जीत चुका होता था, और हम भुट्टावादी योद्धा कहलाते थे।
तो अब जब कभी बारिश हो, और भुट्टे वाला दिखे…
एक भुट्टा ज़रूर लेना, लेकिन खाते हुए ज़रा आँखें बंद कर लेना।
शायद कोई भूला-भटका बचपन तुम्हारे भीतर से चुपके से बोले —
“भैया, जल्दी कर! चौकीदार आता ही होगा!”
“भुट्टा सिर्फ भुट्टा नहीं, वो एक युग है — जिसमें हम थोड़े भूखे थे, थोड़े से चोर भी, लेकिन पूरे मज़ेदार थे!”
( राजीव खरे- भुट्टावादी व्यंग्यकार)

