कभी दुनिया के मंच पर युवा ऊर्जा की बात होती थी। पर आज आलम यह है कि ग्रह राजनीति की स्टेयरिंग थाम रखी है कुछ ‘वरिष्ठ नागरिकों’ ने – वो भी ऐसे कि उम्र भले रिटायरमेंट की हो, पर मंशा है पूरी दुनिया को “री-टायर” करने की।
और कुछ तो ये कहावत साबित करने में लगे हैं कि उम्र 55 की और दिल बचपन का।
तो आइए, मिलिए उन बुज़ुर्गों की टोली से, जो सुबह वॉकर लेकर निकलते हैं, और शाम तक किसी देश की अर्थव्यवस्था पर वॉर कर आते हैं:
- पुतिन (72 वर्ष) – “मैं अकेला ही काफी हूँ” ब्रांड
क्रेमलिन से निकलते ही लगता है जैसे कोई पुराने ज़माने का जासूस बाहर निकला हो – चुपचाप, गंभीर, बिना मुस्कराहट के।
यूक्रेन को तो उन्होंने “घर का रास्ता” दिखाने के चक्कर में बमबारी का नया नक्षत्र खोज लिया। उनकी चाल में शांति, पर जेब में “नो टॉलरेंस बटन” लगता है रिटायरमेंट के बदले उन्होंने टैंक चलाना चुन लिया है।
- शी जिनपिंग (72 वर्ष) – “कॉपी पेस्ट सुपरपावर” के प्रधान
उम्र 72 की, पर मन में अभी भी “मेड इन चाइना” का जुनून। जहाँ कहीं कोई चीज़ बनती है, शी जी उसे देखते हैं और कहते हैं – “हम भी बनाएंगे, सस्ता और तेज़!”
उनकी सेना भी मोबाइल एप्स की तरह अपडेट होती रहती है – हर महीने एक नया फीचर, और हर पड़ोसी को नया डर कि कब यह शांति शांति की माला जपते हुए उनका नक़्शा बदल दें। - नेतन्याहू (75 वर्ष) – “युद्ध नायक तानाशाह?”
इज़राइल में नेतन्याहू जी के बगैर चुनाव अधूरा माना जाता है। उनकी रणनीति सीधी है – “पहले हमला, फिर वार्ता, और अंत में कैमरा!” इतने साल की राजनीति में वे अब युद्ध को भी “फुल HD” में दिखाने की कला सीख चुके हैं। अब तो इनकी फ़ितरत ऐसी हो चुकी है कि बस युद्ध का मौक़ा चाहिए हमास को तो उन्होंने ऐसा कूटा है कि इंसानियत और UNO दोनों हार चुके हैं। - डोनाल्ड ट्रंप (79 वर्ष) – “महाशक्ति या मीमशक्ति?”
79 की उम्र में भी ट्रंप साहब सुबह 3 बजे Truth Social पर ‘Breaking’ लिखकर खुद ही खबर बन जाते हैं। उनका एक ट्वीट, तेल के दाम गिरा सकता है और दूसरा ट्वीट, स्टॉक मार्केट।उन्होंने साबित कर दिया कि “बुद्धि” का कोई निश्चित उम्र नहीं होती – कभी भी जा सकती है! उनकी हेयरस्टाइल और विदेश नीति, दोनों हवा के रुख पर निर्भर करती हैं। इनकी फ़ितरत मोहल्ले के उस ख़ुराफ़ाती बच्चे जैसी है जो पूरे मोहल्ले और अपने घर को अपनी हरकतों से न सिर्फ़ परेशान रखता है बल्कि व्यस्त भी। - खामेनेई (84 वर्ष) – “पुरातन क्रांति का आधुनिक संस्करण”
84 साल की उम्र में जब कोई बाबा रामदेव के योग के भरोसे चल रहे होते हैं, ईरान के खामेनेई साहब पूरे देश को इस्लामी सिद्धांतों पर दोबारा प्रोग्राम कर रहे होते हैं।
महिलाओं के पहनावे से लेकर इंटरनेट तक – सब पर उनका “सेंसरयुक्त आशीर्वाद” होता है। ऐसे लगते हैं जैसे टाइम ट्रैवल करके किसी और युग से सीधे आ पहुंचे हों। पर ये चचा जान बड़े बड़ों से नहीं डरते। भले उमर कबर में पाँव लटकाने की हो पर अपनी बिरादरी में चौधरी बनने का ख़्वाब अभी भी रखते हैं। और इन सबसे अलग – नरेंद्र मोदी जी (74 वर्ष): गरिमा और संतुलन की ऐसी मिसाल और चुस्ती कि लोग कहें 75 साल के बूढ़े या 75 साल के जवान। ( इस लेख का टाइटल इनके लिये बिल्कुल नहीं है)
जहाँ बाकी नेता धौंस और धमाकों से दुनिया को हिलाते हैं, वहीं मोदी जी धीरे से कूटनीति की रसोई में ‘मसाला टी’ रखकर बातें पकाते हैं। 74 की उम्र में भी ऐसे एक्टिव कि योग करते हैं कि युवा नेता थक जाएं।
राष्ट्रवाद, तकनीक, और परंपरा – तीनों को मिलाकर उन्होंने भारत को ऐसा मिश्रण बना दिया है, जिसे कोई भी देश अब हल्के में नहीं लेता।
और सबसे बड़ी बात – “उनकी हर चुप्पी, विदेश नीति का अगला अध्याय होती है। बस परेशानी यह है कि देश की तरफ़ कम और विदेश की तरफ़ ज़्यादा देखते हैं।
तो निष्कर्ष क्या है?
हम जैसे लोग सोचते हैं – “60 के बाद तो बस पार्क की बेंच और सीनियर सिटीजन पास।” लेकिन इन “दुनिया के करामाती बुड्ढों” को देखकर लगता है कि असली धमाका तो रिटायरमेंट के बाद शुरू होता है!
तो हे वरिष्ठ नागरिकों, उठिए…
डंबल नहीं तो अख़बार ही उठाइए,
दुनिया बदलिए नहीं तो कम से कम व्हाट्सऐप ग्रुप में क्रांति लाइए!
क्योंकि जब पुतिन-पिंग और ट्रंप कर सकते हैं,
तो आप भी कुछ तो कर ही सकते हैं!
—राजीव खरे
(वरिष्ठों की सक्रियता के समर्थक, पर हथियारों के नहीं)

