रायपुर नगर निगम ने आखिरकार ऐलान कर ही दिया – अब सफाईकर्मियों को पूरे आठ घंटे काम करना होगा। वाह! मानो अब तक वे ऑफिस में क्रिकेट खेल रहे थे और अब जाकर बल्ला-गेंद छुड़वा लिया गया हो।
कहने को यह नियम शहर की गंदगी खत्म करने के लिए है, मगर असली सफाई तो शायद निगम दफ्तर के अंदर होनी चाहिए थी। फर्क देखिए –
• सफाईकर्मी को आठ घंटे ड्यूटी करनी होगी, वरना वेतन रुकेगा।
• अफसर अगर आठ महीने तक छुट्टी मार दें तो उनकी तनख्वाह फिर भी समय पर।
बायोमेट्रिक का जादू
अब बायोमेट्रिक मशीन लगेगी। कर्मचारी आएगा, अंगूठा लगाएगा और मशीन बताएगी – “जी हाँ, ये साहब आठ घंटे सड़क पर रहे।”
पर सवाल यह है कि जो अफसर कागज़ों पर सफाई दिखाकर मोटा बिल पास करवा देते हैं, उनके लिए कौन-सी मशीन लगेगी? क्या उनका भी बायोमेट्रिक भ्रष्टाचार टेस्ट होगा?
ठेकेदार की ‘आत्मकथा’
ठेका प्रणाली हटाने की चर्चा है। ठेकेदार बेचारे उदास हैं। आखिर उन्होंने भी तो बरसों जनता को कचरे के साथ जीने की कला सिखाई है। अगर सब कुछ पारदर्शी हो गया, तो उनकी ‘रचनात्मकता’ कहाँ जाएगी?
जनता का योगदान
जनता भी पीछे नहीं है। कचरा सड़क पर फेंको और फिर फेसबुक पर लिखो – “शहर में सफाई नहीं है।” यह वैसा ही है जैसे परीक्षा में नकल करो और फिर टीचर को दोष दो कि उन्होंने पढ़ाया नहीं।
सफाईकर्मियों का दर्द
सफाईकर्मी बेचारे सोच रहे हैं – “आठ घंटे काम करना तो ठीक है, पर कम से कम तनख्वाह भी आठ घंटे में आ जानी चाहिए।” फिलहाल हालत यह है कि तनख्वाह कभी-कभी आठ हफ़्ते, कभी आठ महीने बाद आती है।
व्यंग्य का निचोड़
असल में सफाईकर्मियों पर आठ घंटे की तलवार चलाकर प्रशासन जनता को यह संदेश देना चाहता है कि—
“देखिए, हमने काम शुरू कर दिया है। अब गंदगी अगर बनी रहती है तो या तो कर्मियों की गलती है, या जनता की। हम अफसर तो बस आदेश निकालने के लिए पैदा हुए हैं।”
( राजीव खरे – बायोमेट्रिक मशीन को देख सफाई कर्मी का इंतज़ार करता रायपुर का एक नागरिक)

