जल्द ही जमैटो, ब्लिंकिट से वन्यजीवों के लिये पुण्य की थाली
कल जब मैं जबलपुर से रायपुर लौट रहा था तो रास्ते में मंडला के समीप एक घाट की पुलिया पर बंदरों का पूरा खानदान एकदम आराम से बैठा मिला। ऐसा लग रहा था जैसे यह कोई वन्यजीव पंचायत हो और अजेंडा तय हो – “आज किस गाड़ी वाले से केला लेना है और किससे मूंगफली।”
गाड़ियों से गुजरते लोग एक-दूसरे को मात देने की कोशिश में थे – कोई मूंगफली फेंक रहा था, कोई फल, कोई बिस्किट और कोई मिठाई, और हर थैली के साथ पुण्य भी पैक होकर उछल रहा था।
हमने भी तमाशा देखने को गाड़ी रोकी। तभी एक बंदर ने ठंडी नज़रों से हमें देखा और मानो निगाहों-निगाहों में सवाल किया –“भैया, तुम क्या खिलाओगे?” अब अचानक आए इस पशु-प्रेम भोज के लिए हम तैयार कहाँ थे। सो हमने कहा – “गाड़ी बढ़ाओ यार।” लेकिन सरकारें हमेशा बंदरों से नहीं, बच्चों से गिरती हैं। हमारे नाती ने उसी वक़्त विरोध दर्ज कर दिया –”नाना! आप फल लाए ही नहीं? बेचारे बंदरों को भूखा छोड़ आए? कम से कम Zomato से खाना या Blinkit से फल ही बुलवा देते।” छोटे नाती ने विपक्षी दल की तरह हाथ उठाकर समर्थन भी कर दिया। और देखते ही देखते मेरी सरकार गिर गई।
पुण्य की थाली
यह सच है कि पहाड़ियों और जंगलों में बंदर बहुत दिखते हैं, पर जंगल में उनके लिए खाना कम होता जा रहा है। इसलिए वो सड़क किनारे पुलिया की दीवारों पर बैठक जमाते हैं कि कोई दयालु इंसान पुण्य कमाने के लिए उन्हें मूंगफली-बिस्किट फेंक दे।
अब वन विभाग लाख समझाए –”भैया, फल और मूंगफली तक तो ठीक है, पर मिठाई और बिस्किट मत खिलाइए।”लेकिन जनता का तर्क है – “पुण्य का मज़ा तुम्हें क्या मालूम! पुण्य तो बिस्किट और मीठा खिलाने में ही आता है।”
गाय का मेन्यू और नाती का सवाल
बंदरों की बहस यहीं ख़त्म हुई नहीं थी कि एक दिन नाती ने मुझसे पूछा –”नाना, गाय क्या खाती है?” मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा – “बेटा, गाय घास खाती है।”
उसका जवाब मुझे हिला गया – “नाना, मैंने तो गाय को सिर्फ़ प्लास्टिक से खाना निकाल कर खाते देखा है। घास तो कॉलोनी के लॉन में होती है, वहां भी माली डंडा लेकर खड़ा रहता है। तो गाय को घास कहाँ से मिलती है?” कालोनी वाले भी गाय को घास की बजाय रोटी और लड्डू खिलाते हैं।
अब उसके सवाल ने मेरे दिमाग़ की स्क्रीन पर वही न्यूज चैनल खोल दिया, जिसमें एंकर पूरे गले की नसें तानकर चिल्ला रहा था –“ अंग्रेज़ों की गाय मटन खाती है! और इसी राष्ट्रवादी आघात के चलते हमारे प्रधानमंत्री ने अमेरिका से दूध लेने से मना कर दिया!”
गोबर का अंतरराष्ट्रीय संकट
अब सोचिए – अगर विदेशी गायें मटन मिश्रित चारा खाकर दूध देती हैं, तो उनका गोबर कैसा होगा? क्या वो भी अंतरराष्ट्रीय हो जाएगा? और फिर क्या हमारी धार्मिक आस्थाओं में इस्तेमाल होने वाला “पूजनीय गोबर” इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट एक्ट के अधीन आ जाएगा?
कल्पना कीजिए – एक दिन किसी मंदिर के हवन में पंडितजी कहें – “ये गोबर विशेष ऑफर में अमेरिका से आयात किया गया है, डॉलर में दर तय हुई थी।”
तो क्या पुण्य भी डॉलर के भाव से चढ़ेगा?
पुण्य का गणित
असल समस्या यही है कि हम पुण्य को खाने से जोड़ बैठे हैं।
• गाय को रोटी खिलाई = पुण्य।
• बंदर को बिस्किट फेंका = पुण्य।
• कुत्ते को दूध डाला = पुण्य।
बाकी ये जानवर असल में क्या खाते हैं, उनकी सेहत पर क्या असर पड़ता है – इससे हमें कोई लेना-देना नहीं।
वन्यजीव और फूड डिलीवरी ऐप
नाती की मासूम सलाह ने मुझे सोचने पर मजबूर किया – अगर जमैटो और ब्लिंकिट सचमुच बंदरों के लिए डिलीवरी शुरू कर दें तो नज़ारा कैसा होगा?
• Blinkit पर नया ऑफर: “केला बाउल ₹29 में – खास जंगल फ्लेवर के साथ।”
• Zomato डिलीवरी ब्वॉय: “सर, आपका ऑर्डर पुलिया नंबर 7 पर बैठे तीन बंदरों को डिलीवर कर दिया गया है।”
• रेटिंग सिस्टम: बंदर केले का छिलका फेंककर 4 स्टार दे देंगे – “केला थोड़ा कच्चा था।”
और अगर डिलीवरी लेट हुई तो बंदर खुद ही बैग छीनकर “इंस्टेंट पिकअप” कर लेंगे।
गाय और ई-कॉमर्स
गाय भी पीछे नहीं रहेगी। कॉलोनी के गेट पर खड़ी होकर माली से कहेगी – “भैया, Blinkit पर घास मिलती है क्या? लोग तो सिर्फ़ रोटियाँ डिलीवर करते हैं।”
🎭 दो डायलॉग व्यंग्य की तुकबंदी में:
1. बंदर (मोबाइल पर ऐप खोलते हुए): “भैया, फल जल्दी भेजना, बच्चों का टिफ़िन टाइम निकल रहा है।”
2. गाय (कॉलोनी के बाहर खड़ी होकर): “भाई लोगों, घास तो Blinkit पर भी नहीं मिलती क्या?”
व्यंग्य का निष्कर्ष
अब सवाल यह है कि आखिर इस देश में फूड डिलीवरी किसे ज़्यादा चाहिए – हमें या इन बेजुबानों को?
• बंदरों का मेन्यू ऐप पर टिका है।
• गाय का आहार पॉलीथिन पर आधारित है।
• और इंसान का पुण्य बिस्किट-लड्डुओं पर निर्भर है।
इधर नाती सवाल पूछते हैं और उधर एंकर चीख़ते हैं। और हम सोचते रहते हैं कि पुण्य, प्लास्टिक, गोबर और डिलीवरी ऐप्स – सब मिलकर भारत को विश्वगुरु कैसे बनाएंगे।
( राजीव खरे- इस सोच में कि आन लाइन ख़रीददारी न आने का दुख ज्यादा है कि बंदरों को खाना नहीं खिला पाने का )

