हिमालय दुखी है- जंगल और पहाड़ काटकर बनी सुरंग सड़क और होटल- यह विकास है या त्रासदी
रायपुर से आया देवांगन परिवार महीनों से इस यात्रा का इंतज़ार कर रहा था। माँ ने गंगोत्री मंदिर में मन्नत माँगी थी, बच्चे बर्फ़ देखने को उत्साहित थे और पिता ने कहा था—”चलो, इस बार पहाड़ों में भगवान के दर्शन भी करेंगे और छुट्टियाँ भी बिताऐंगे।” गंगोत्री पहुँचकर सबने राहत की साँस ली। होटल की खिड़की से भागीरथी नदी दिख रही थी। बच्चे खिड़की पर टिके बोले—“पापा, देखो नदी कितनी तेज़ बह रही है, जैसे दौड़ रही हो।”
लेकिन रात के सन्नाटे में अचानक गड़गड़ाहट हुई। खिड़कियाँ काँपने लगीं। माँ घबराकर बोली— “ये कैसी आवाज़ है?” पिता ने बाहर झाँका तो देखा—पहाड़ का एक हिस्सा मिट्टी, पत्थरों और पानी का सैलाब बनकर सीधे होटल की ओर बढ़ रहा था। चीख़ों से कमरा भर गया। बच्चे पुकार रहे थे— “पापा… बचाओ!”

पलक झपकते ही ज़मीन हिली, होटल धँस गया और नदी में समा गया। उनकी कार बाहर खड़ी थी, पर वह भी माचिस की डिब्बी की तरह बह गई। इंसान की बनाई हर चीज़ प्रकृति की ताक़त के आगे पलभर में राख हो गई। सुबह जब बचाव दल पहुँचा, तो वहाँ न होटल था, न कार—बस मिट्टी, पत्थर और टूटा हुआ सामान।
यह केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उस रात भागीरथी किनारे ठहरे दर्जनों परिवारों की कहानी थी। लेकिन असली सवाल यह है कि ऐसी त्रासदियाँ क्यों बार-बार दोहराई जाती हैं? केदारनाथ की 2013 की आपदा से लेकर हाल ही के उत्तरकाशी हिमस्खलन तक, हर बार चेतावनी दी गई कि हिमालय जैसे नाज़ुक पारिस्थितिकी क्षेत्र में अंधाधुंध निर्माण, सुरंग खोदना, सड़क चौड़ीकरण और नदी किनारे होटल बनाना सीधी आपदा को निमंत्रण है। लेकिन दलाली और पर्यटन के नाम पर सबकुछ अनसुना कर दिया गया।

यह भ्रम फैलाना भी खतरनाक है कि थोड़े-बहुत प्लांटेशन से जंगल लौट आते हैं। जंगल और पहाड़ की असली संरचना सैकड़ों वर्षों में मिट्टी, पेड़ों की जड़ों और जल-स्रोतों के संतुलन से बनती है। इन पर छेड़छाड़ से वही संतुलन बिगड़ता है और नतीजे में भूस्खलन, बाढ़ और हिमस्खलन की त्रासदियाँ सामने आती हैं।
आज हालात यह हैं कि-
जोशीमठ जैसे कस्बे धँस रहे हैं, ग्लेशियर झीलें फटने की कगार पर हैं, और जलवायु परिवर्तन के चलते वर्षा और बर्फ़बारी का पैटर्न असामान्य हो चुका है। फिर भी सरकारें पर्यटन और व्यापार को बढ़ावा देने के नाम पर पहाड़ों का सौदा कर रही हैं।अब ज़रूरी है कि इस सोच को पलटा जाए।
हिमालय को केवल ‘पर्यटन स्थल’ नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानकर नीतियाँ बनाई जाएँ। पर्यावरणीय मंज़ूरी कठोरता से लागू हो और दलाली पर लगाम लगे। विकास और पर्यटन को टिकाऊ मॉडल पर आधारित किया जाए, ताकि प्रकृति और लोगों का संतुलन सुरक्षित रहे।
हिमालय की गोद में बसे ये कस्बे केवल छुट्टियों की यादें नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जल और जीवन के स्रोत हैं। अगर हमने इन्हें व्यापार और लालच की भेंट चढ़ा दिया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी।
( राजीव खरे- चीफ एडिटर )

