
कोरबा के पाली में विश्व आदिवासी दिवस 2025: संस्कृति, जनसंख्या और नेतृत्व का गौरवपूर्ण प्रदर्शन”
पाली का मैदान 9 अगस्त की सुबह मानो रंगों, तालों और परंपराओं का संगम बन गया। ढोल-मांदर की गूंज, तीर-कमान की झलक और सिर पर उठाए पारंपरिक झंडे… यह नजारा सिर्फ एक उत्सव का नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, अपने हक़ और अपनी पहचान के गर्व का था। विश्व आदिवासी दिवस 2025 पर कोरबा जिले के पाली में आदिवासी समाज ने जो एकजुटता दिखाई, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गई।
कार्यक्रम का दृश्य और घटनाक्रम:
सुबह से ही पारंपरिक वेशभूषा में हजारों आदिवासी भाई-बहन पाली के मैदान में जुटने लगे। ढोल-मांदर की थाप पर नृत्य करते लोग और झंडों के साथ समूह बनाकर आते जत्थे पूरे इलाके में उत्साह का माहौल पैदा कर रहे थे। देखते ही देखते मैदान में अनुमानित दस हजार से अधिक लोग इकट्ठा हो गए। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में क्षेत्रीय विधायक एवं गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तुलेश्वर मरकाम पहुंचे। उनके साथ युवा मंडल, महिला मंडल, विभिन्न आदिवासी संगठन और सांस्कृतिक दल भी मौजूद रहे।
आयोजन के तहत एक विशाल रैली निकाली गई। रैली में शामिल लोग पारंपरिक नृत्य करते और “शराब भट्टी बंद करो” के नारों के साथ आगे बढ़ते गए। जब यह रैली पाली थाना के सामने पहुंची तो नारेबाजी और तेज हो गई। रैली के कारण सड़कों पर लंबा जाम लग गया और वाहनों की कतारें दोनों तरफ खड़ी हो गईं। पाली पुलिस मौके पर मौजूद रही और जनसमूह को शांतिपूर्वक मार्गदर्शन देने का प्रयास करती रही।
विश्व आदिवासी दिवस :
विश्व आदिवासी दिवस की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 दिसंबर 1994 को की थी। यह दिवस हर साल 9 अगस्त को मनाया जाता है, जो 1982 में जेनेवा में आयोजित पहले ‘यूएन वर्किंग ग्रुप ऑन इंडीजिनस पॉप्युलेशंस’ की बैठक की बरसी है। इसका उद्देश्य दुनिया भर के आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा, उनकी संस्कृति के संरक्षण और उनके अस्तित्व को सुरक्षित रखना है। यूनेस्को के अनुसार, दुनिया में 370 से 500 मिलियन आदिवासी लोग रहते हैं, जो लगभग 7000 भाषाओं और 5000 अलग-अलग संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये समुदाय न केवल परंपराओं को सहेजकर रखते हैं, बल्कि पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज:
छत्तीसगढ़ आदिवासी आबादी के मामले में देश के प्रमुख राज्यों में से एक है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जनजातियों का है। यहां की प्रमुख जनजातियों में गोंड, बैगा, भतरा, हल्बा, संवारा, औड़, कान्वर, खड़िया जैसी जातियां शामिल हैं। इसके अलावा विशेष पिछड़ी जनजातियों (पीवीटीजी) में बैगा, कमर, हिल कोरबा, बिरहोर और आबुझ माड़िया आते हैं, जिनके लिए राज्य सरकार ने विशेष विकास एजेंसियां बनाई हैं। छत्तीसगढ़ का आदिवासी समाज अपनी अनूठी भाषा, लोकगीत, नृत्य और उत्सवों के लिए जाना जाता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहे हैं।
छत्तीसगढ़ के प्रमुख आदिवासी नेता:
इस राज्य के इतिहास और राजनीति में कई आदिवासी नेताओं ने अपनी छाप छोड़ी है। वीर नारायण सिंह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ के पहले शहीद के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया। बस्तर विद्रोह (1910) के नायक गुंडा धुर ने भी अंग्रेजी शासन को चुनौती दी और आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। राजमोहिनी देवी ने महिला सशक्तिकरण, सामाजिक सुधार और शराबबंदी के लिए आंदोलन खड़ा किया, जिसके लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आदिवासी समाज के सशक्त राजनीतिक चेहरों में से एक हैं, जबकि कवाहीसी लख़्मा लंबे समय से जनहित और आदिवासी अधिकारों के लिए सक्रिय हैं।
पाली की इस ऐतिहासिक भीड़ ने यह साबित कर दिया कि आदिवासी समाज न केवल अपनी संस्कृति को जीवित रखे हुए है, बल्कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित और सजग भी है। ढोल की थाप पर गूंजते नृत्य, हाथों में लहराते झंडे और हज़ारों आवाज़ों में गूंजते नारे… यह सिर्फ एक दिन का उत्सव नहीं था, बल्कि एक संदेश था —
“हम हैं, हम रहेंगे… और हमारी विरासत सदियों तक अडिग रहेगी।”
( राजीव खरे चीफ एडीटर)
