सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ‘हिस्ट्री क्रिएटिंग’ निर्णय दिया है कि देश में अब आवारा कुत्तों और मवेशियों की रक्षा सुनिश्चित की जाए, और किसी को भी उन्हें नुकसान पहुँचाने का अधिकार नहीं।
कानूनन यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है, जैसे किसी आदर्शवादी पंचतंत्र की कथा हो, लेकिन ज़मीन पर उतरिए तो यही कथा ‘कुरूपकथा’ बन जाती है — जहाँ आदमी सिसकता है, और जानवर संविधान की धारा 21 का व्यावहारिक लाभ उठाते हैं।
कुत्तों के संवैधानिक अधिकार बनाम नागरिकों की नींद
देश के हर मोहल्ले में अब कोई न कोई ‘लोकल जॉर्ज’ या ‘शेरू दादा’ तैनात है — जो कॉलोनी की गली पर शासन करते हैं। किसी की बाइक पर पैर रखकर झपट लेना, दूधवाले की थैली फाड़ देना, या बच्चों को खेलते समय दौड़ा लेना अब उनकी ‘फिटनेस एक्टिविटी’ है।
लेकिन अगर किसी ने बचाव में पत्थर उठाया, तो मामला तुरंत “एनिमल क्रुएल्टी एक्ट” में चला जाता है।
यह वही देश है जहाँ दो महीने पहले दिल्ली, गाजियाबाद, लखनऊ, भोपाल, जयपुर, चंडीगढ़ — लगभग हर शहर में — आवारा कुत्तों ने मिलकर दो दर्जन से ज़्यादा बच्चों और बुज़ुर्गों को नोच खाया।
कुछ की जान चली गई, कुछ की आजीवन विकलांगता हो गई।
मेनका गांधी का ‘डॉगमेटिक’ युग
इस सबके बीच एक नाम फिर से हवा में तैरता है — श्रीमती मेनका गांधी।
पशु संरक्षण की जब भी बात होती है, तो मेनका जी का नाम ‘धार्मिक मंत्र’ की तरह उच्चारित होता है।
उनके मुताबिक कुत्ते काटते नहीं, बल्कि “प्रतिक्रिया” देते हैं।
अगर यही तर्क मानवों पर लागू कर दिया जाए, तो देश के आधे क्राइम रिकॉर्ड को ‘मानवीय प्रतिक्रिया’ कहकर माफ़ किया जा सकता है!
उनकी पुरानी ‘पशु-ममता’ आज अदालतों और एनजीओ की बेंचों पर फिर से मुस्कुरा रही है।
मेनका जी के स्कूल ऑफ़ थॉट के हिसाब से अब हमें बच्चों को सिखाना होगा कि “बेटा, शेरू काटे तो उसे थपकी दो — उसने तुम्हें समाज सुधारक समझ लिया है।”
डॉग शेल्टर : नया ठेका, नया अवसर
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालनार्थ अब नगर निगम और शहरी निकायों को हर शहर में ‘डॉग शेल्टर’ या ‘एनिमल केयर सेंटर’ बनाने होंगे।
देश में अनुमानतः 7.5 करोड़ आवारा कुत्ते हैं — यानी हर 18 नागरिकों पर एक सरकारी ‘शेरू’।
अब सोचिए, अगर हर 1000 कुत्तों के लिए एक सेंटर बने, तो करीब 75,000 सेंटर चाहिए।
प्रत्येक सेंटर की औसत लागत (ज़मीन, बिल्डिंग, स्टाफ, वैक्सीन, खाना आदि) लगभग ₹25 लाख मान लीजिए — तो कुल लागत सीधे 18,750 करोड़ रुपये!
अब इतने बड़े प्रोजेक्ट में टेंडर, कोटेशन, निर्माण, और ठेकेदारी का जो ‘पवित्र अवसर’ पैदा होगा, वह किसी मंदिर निर्माण से भी ज़्यादा लोकहितकारी सिद्ध होगा — कम से कम अधिकारियों और ठेकेदारों के लिए।
नगर निकायों को अब नया बहाना मिल गया है — “जनता को काटने वालों के लिए भी आश्रय बनाना है।”
गायें, सांड और सड़क पर ‘देसी मिनोटौर’
अब बात गायों की।
सड़क पर घूमते ये मवेशी कोई ‘आवारा आत्माएँ’ नहीं हैं — इनके पास स्थायी मालिक होते हैं, जो इन्हें “दूध नहीं दे रहीं तो घूमने दो” वाली नीति के तहत छोड़ देते हैं।
गाँवों और कस्बों में किसान अक्सर अपने बूढ़े मवेशियों को सड़कों पर उतार देते हैं, और ये आगे जाकर शहरी फुटपाथों के नए निवासी बन जाते हैं।
ये वही गायें हैं जो रात के अँधेरे में हाईवे पर चमकते ट्रक की हेडलाइट देखकर स्थिर हो जाती हैं — और फिर दुर्घटना में या तो गाय मरती है या ड्राइवर।
पर फर्क देखिए —
अगर गाय मरी, तो ‘गोरक्षक’ ट्रक चालक को वहीं पीट देते हैं;
अगर चालक मरा, तो कोई ‘मानवरक्षक’ उठकर यह नहीं पूछता कि सड़क पर गाय आई कैसे?
न्यायपालिका का दुविधा दर्शन
सुप्रीम कोर्ट का उद्देश्य निस्संदेह करुणामय है, लेकिन न्याय के साथ व्यवहारिकता का भी रिश्ता होता है।
अगर कुत्तों को मारना अपराध है, तो मनुष्य को काटना भी उतना ही अपराध होना चाहिए।
क़ानून की आँखें पट्टी से बंधी हैं — लेकिन क्या अब वह पट्टी इतनी मोटी हो गई है कि सड़क पर खून के धब्बे भी नज़र नहीं आते?
क्या कुत्ते और गायें अब ‘राज्य के संरक्षित नागरिक’ बन गई हैं, जबकि इंसान ‘कानूनी खतरा’?
व्यवहारिक समस्याएँ और सरकारी गणित
हर नगर निकाय अब यह सोच रहा है कि डॉग शेल्टर कहाँ बनाए, किसे ठेका दें, कौन वैक्सीनेशन करे, कौन खाना सप्लाई करे।
जहाँ गरीबों के लिए झुग्गी-झोपड़ी तक नहीं बन पा रही, वहाँ अब कुत्तों के लिए वातानुकूलित आश्रय होंगे।
नगर निगम के बजट में “डॉग फूड, टीकाकरण, और मेडिकल” नाम से जो नए मद जुड़ेंगे, वे भ्रष्टाचार के लिए “गोल्डन बोन” साबित होंगे।
किसी ठेकेदार को ‘फूड सप्लाई’ का काम मिलेगा, किसी नेता को भूमि आवंटन का।
और जो वास्तव में आवारा हैं — वे तो फिर भी सड़कों पर ही रहेंगे, क्योंकि उन्हें कोई सेंटर पसंद नहीं आएगा।
आख़िर सड़क ही तो उनका संविधान है।
कानूनी समानता की मांग

अब समय आ गया है कि अगर किसी आवारा कुत्ते या गाय की वजह से किसी इंसान की मौत होती है, तो उस पशु का मालिक — या जो उसे खुला छोड़ता है — उस पर धारा 302 (हत्या) या कम से कम 304A (लापरवाही से मृत्यु) के तहत मुकदमा चले।
कुत्ते के मालिक ने अगर अपने पालतू को बिना नियंत्रण छोड़ा और उसने बच्चे को काट लिया — तो यह “अपराध” है, “दुर्घटना” नहीं।
इसी तरह, गाय के मालिक ने उसे सड़क पर छोड़ दिया और किसी की जान चली गई, तो वही गुनहगार है।
कानून का भाव यह नहीं होना चाहिए कि जो ‘बोल’ नहीं सकता, वह ‘छूट’ भी पा जाए।
मानव बनाम पशु प्रेम : एक मौन पाखंड
अजीब विडंबना है — कुत्ते के लिए सुप्रीम कोर्ट में नामी वकील पैरवी करते हैं,
पर सैनिकों की सुरक्षा के लिए, भूख से मरते किसानों के लिए, या प्रदूषण से जूझते बच्चों के लिए कोई ‘पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ में यह जज़्बा नहीं दिखता।
ऐसा लगता है कि हम मानवता से थक गए हैं, और अब ‘पशुता’ हमें ज़्यादा रोमांचक लगने लगी है।
टीवी डिबेट में भी जानवरों का पक्ष लेने से ताली ज़्यादा बजती है — क्योंकि वो “सुरक्षित ट्रेंड” है।
समाधान नहीं, संजीवनी चाहिए
यदि सच में देश को समाधान चाहिए तो तीन कदम ज़रूरी हैं —
1. पशु जनसंख्या नियंत्रण: हर नगर निकाय को वैज्ञानिक बंध्याकरण कार्यक्रम चलाना चाहिए।
2. मालिक दंड प्रावधान: पालतू या मवेशी को खुला छोड़ने वाले पर सीधा जुर्माना या केस।
3. मानव प्राथमिकता: किसी भी नीति में नागरिक की सुरक्षा सर्वोपरि हो — कुत्ते या गायें उसके बाद।
अंत में…
हम एक ऐसे दौर में पहुँच चुके हैं जहाँ
• कुत्ते नागरिक हैं,
• गायें देवी हैं,
• और आदमी — एक संभावित अपराधी।
जहाँ इंसान सड़क पर चलता हुआ सोचता है — “भगवान करे आज कोई ‘पशु-प्रेमी’ मुझे काटने न आ जाए।”
क्योंकि इस देश में
भौंकने का हक़ अब मौलिक अधिकार है —
और आदमी?
वह तो बस एक संवेदनशील गलती है।
शायद यही ‘नए भारत’ की परिभाषा है — कानून अगर सिर्फ़ पशुओं को बचाने के लिए बनाया जाएगा, तो वह न्याय नहीं, पशु–सत्ता कहलाएगी।
और जिस दिन कोई सड़क पर गिरा हुआ घायल इंसान बोलेगा —
“मुझे भी किसी शेल्टर में जगह मिल सकती है क्या?”
तो शायद वही दिन होगा जब अदालतों को समझ आएगा कि करुणा का संतुलन भी एकसंवैधानिक अधिकार होना चाहिए।
( एक आदमी जो सोच रहा है कि काश शेल्टर के खेल में मुझे भी कुछ मिल जाता)

