कल सुबह अख़बार खोला तो राशिफल नहीं, रुदन मिला। राजस्थान से दो खबरें — दो अलग-अलग हादसे, मगर दर्द एक जैसा। पहले में एक शराबी डंपर ड्राइवर ने 19 लोगों को रौंद डाला, और दूसरे में बस बजरी लदे ट्रक से टकराई — वहाँ भी वही संख्या, 19 . जैसे मृत्यु ने एक ही दिन दो बार उपस्थिति दर्ज की हो, एक देशव्यापी बयान के साथ कि भारत की सड़कें अब भाग्य नहीं, भय का प्रतीक बन चुकी हैं।
इन दिनों हर सुबह अख़बार का पहला पन्ना किसी युद्धक्षेत्र की रिपोर्ट जैसा लगता है। बस अंतर इतना है कि यहाँ दुश्मन कोई बाहरी ताक़त नहीं, बल्कि हमारी अपनी लापरवाही, हमारा अपना रसूख, और हमारा अपना प्रशासन है।
रसूख की रफ्तार बनाम आम आदमी की लाशें

कभी किसी मंत्री या कारोबारी का बेटा नशे में धुत होकर अपनी “डैडी की कार” उड़ाता है और सड़क पर चलते किसी गरीब रिक्शेवाले, सब्जीवाले या परिवार को रौंद डालता है। कभी कोई “पापा की परी” अपने सोशल मीडिया स्टोरी में “Night Drive 💋💃” डालकर उसी रात किसी की ज़िंदगी बुझा देती है। हादसे के बाद वही कहानी — रोना-धोना, माफ़ी, और फिर मीडिया ट्रायल का एक छोटा सा तमाशा।
इसके बाद होता है चमत्कार — पुलिस की कलम में जैसे कोई जादू है, कमज़ोर धाराएं लगाई जाती हैं। “लापरवाही से गाड़ी चलाना” का केस बनता है, जबकि मामला हत्या के इरादे से गाड़ीचलाने जैसा साफ़ दिखता है। अदालत में चालान जाता है, कोशिश निबंध लिखवा कर छुड़ाने की होती है। और फिर “बेल” मिल जाती है — क्योंकि आरोपी “पढ़ रहा है”, “युवा है”, “भविष्य बर्बाद न हो” जैसे मानवीय तर्क अचानक याद आ जाते हैं।
पर उन 19 मर चुके लोगों का भविष्य कौन लौटाएगा? उनके बच्चों की किताबें कौन खरीदेगा? उनकी औरतों की मांग का सिंदूर कौन पोंछेगा? न्याय सिर्फ़ कोर्ट की फ़ाइल में नहीं, समाज की आत्मा में भी होना चाहिए — और आज वो आत्मा कोमा में है।
पुलिस की मजबूरी या मिलीभगत?
हर बार एफआईआर कमजोर धाराओं में दर्ज होती है — IPC 304A यानी “लापरवाही से मौत”। क्योंकि अगर 304 (culpable homicide) लगाई जाए तो मामला गैर-जमानती बन जाता है, और “साहब” के फोन कॉल पर बेल नहीं मिलती।
पुलिस की इस “नरमी” के पीछे कई बार दबाव होता है — राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक। मगर हर दबाव एक निर्दोष की जान पर भारी पड़ता है। समाज का ये विश्वास कि पुलिस न्याय की पहली सीढ़ी है, अब लगभग टूट चुका है। पुलिस आज अक्सर अमीर की ढाल और गरीब की फाइल बनकर रह गई है।
समाज की चुप्पी भी अपराध है
हमारे समाज ने इन हादसों को “नसीब” मान लिया है। कोई कहता है, “क्या करें, किस्मत खराब थी।”
कोई कहता है, “अरे, बच्चे हैं, गलती हो जाती है।”
पर जिस देश में “गलती” की परिभाषा इंसान की औक़ात देखकर तय होती है, वहाँ इंसाफ़ एक मज़ाक बनकर रह जाता है।
इन घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर दो दिन तक गुस्सा आता है — #JusticeForVictims — फिर अगले दिन कोई नया हादसा, नई हेडलाइन, और पुराना दर्द भूल जाते हैं। ये मौन ही अपराधियों की सबसे बड़ी ताक़त बन चुका है।
प्रशासन का ढांचा: जब कानून रसूख के आगे झुक जाता है
भारत में सड़क सुरक्षा के लिए कानून हैं, नियम हैं, दंड हैं — मगर ज़मीन पर उनका असर वैसा ही है जैसे हेलमेट पर रखा गुलाब का फूल। Motor Vehicles Act की धाराएं मजबूत हैं, पर उनका इस्तेमाल “चालान” के लिए होता है, “जेल” के लिए नहीं।
अमरीका, यूरोप या जापान जैसे देशों में अगर कोई नशे में वाहन चलाकर किसी की जान लेता है, तो उसे “Vehicular Manslaughter” के तहत 10 से 25 साल की सज़ा होती है। वहाँ “लापरवाही” को गलती नहीं, अपराध माना जाता है।
भारत में वही अपराध “कानूनी प्रक्रिया” में इतना पतला कर दिया जाता है कि अंततः एक “सॉरी” और “बेल” से मामला खत्म हो जाता है।
समाधान – सज़ा ही नहीं, संस्कार की भी ज़रूरत भी है
सिर्फ़ कानून कड़ा करना काफी नहीं होगा। हमें अपनी सामाजिक मानसिकता भी बदलनी होगी।
1. ड्राइविंग लाइसेंस सिस्टम में सुधार: लाइसेंस अब भी रिश्वत और जुगाड़ से मिल जाते हैं।
2. शराब और ड्राइविंग पर शून्य सहिष्णुता नीति: Breath Analyzer से बच निकलने वालों के लिए न्यूनतम 5 साल की सज़ा तय होनी चाहिए।
3. वाहन निर्माता कंपनियों और इंश्योरेंस एजेंसियों पर निगरानी: कई हाई-एंड कारें सड़कों पर स्पीड लिमिट से परे बनाई जाती हैं, जिनके लिए कोई लोकल निगरानी नहीं।
4. सामाजिक शिक्षा: बच्चों को सिखाया जाए कि गाड़ी चलाना “Status Symbol” नहीं, जिम्मेदारी है।
रफ्तार से तेज़ इंसाफ़ कब मिलेगा?
हर बार जब कोई अमीर, शराबी, या रसूखदार अपनी गाड़ी से किसी गरीब की जान लेता है, तो असल में मरता एक व्यक्ति नहीं — मरती है व्यवस्था की साख, मरती है इंसाफ़ की उम्मीद, औरमरता है नागरिकों का भरोसा।
अगर सड़कों पर खून सस्ता और बेल आसान रहेगी, तो ये देश कभी सभ्य नहीं कहलाएगा, चाहे उसके पास कितने ही Flyover और Expressway क्यों न हों।
अब वक़्त आ गया है कि हम “ड्राइवर” नहीं, “कातिल” पहचानना शुरू करें।
क्योंकि जब तक ग़लती को अपराध का दर्जा नहीं मिलेगा — तब तक हर सड़क पर मौतें यूँ ही दौड़ती रहेंगी।
राजीव खरे (चीफ ब्यूरो छत्तीसगढ़)

