“ट्रंपपुराण : भक्त, विरोधी और गोदी मीडिया की त्रिवेणी”
दुनिया में एक ही आदमी है, जो बैठे-बैठे नोबेल “अशांति” पुरस्कार का सबसे बड़ा दावेदार है—नाम है डोनाल्ड ट्रंप। यह वही प्राणी है जिनकी एक “फ्रेंडशिप लाइन” पर भक्तों और गोदी मीडिया ने ऐसे नृत्य किया मानो अगले महीने डॉलर में उनकी लाड़ली बहना योजना की किस्तें खाते डॉलर में आनी शुरू हो जाएंगी ।
उधर विरोधी मीडिया भी पीछे नहीं था। वह सोच रहा था कि अब विश्वगुरु और ट्रंप की जोड़ी बनेगी तो उसे ‘विरोध’ का ठेका मिल जाएगा सालों भर।
लेकिन फिर ट्रंप जी की नज़र सौतन पाकिस्तान पर पड़ गई और उसने मुनीर को गले लगाकर जभारत पर टैरिफ का बम गिरा दिया। भक्तों और गोदी मीडिया के चेहरे उसी दिन ऐसे लटक गए जैसे किसी ने टीवी के रिमोट से ही बैटरी निकाल दी हो। अचानक “माई फ्रेंड” वाला ट्रंप “माई फ्रेंड का दुश्मन” बन गया।
मीडिया ने यू-टर्न मारा, भक्तों ने भी मारा, और विरोधियों ने सोचा—वाह, सोने पर सुहागा! अब सरकार और ट्रंप दोनों को कोसा जाएगा।
पर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अचानक एक दिन ट्रंप को बोधि वृक्ष के बिना ही ज्ञान हो गया और वे फिर से भारत–प्रेमी बन बैठे। अब भक्त फिर गाना ढूंढ रहे हैं—”ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे” गाएं या “दोस्त दोस्त ना रहा”। विरोधी सोच में हैं कि भाई, अगर ये दोस्ती गाई जाएगी तो हमें हूटिंग करनी है या ताली बजानी है।
इस पूरे ड्रामे में असली मज़ा यह है कि विश्वगुरु खुद मौनी बाबा बने ध्यान में लीन हैं। बाकी सब भक्त, गोदी मीडिया और विरोधी—बस गाने चुनने और नारे बदलने के चक्कर में एक-दूसरे से भिड़े जा रहे हैं।
और यही है ट्रंपपुराण की लीला—जहाँ हर कोई परेशान है, पर असली मज़ा ट्रंप ही ले रहे हैं। पर अब भक्तों, विरोधियों और गोदी मीडिया की उलझनें सिर्फ ट्रंप तक ही सीमित नहीं रहीं। मामला अब चीन और रूस तक फैल चुका है। याने कहानी अब “ट्रंपपुराण से चीनपुराण तक” पहुँच गई है ।
कल तक यही जमात गली–गली, नुक्कड़–नुक्कड़ “चीनी सामान का बहिष्कार” का झंडा उठाए घूम रही थी। दिवाली में मिट्टी का दिया जलाने की शपथ लेकर ऐसे प्रचार कर रहे थे मानो हर LED बल्ब जलाने वाला सीधे चीन की अर्थव्यवस्था को ऑक्सीजन दे रहा हो। पर जैसे ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति का पारा बदला, वही भक्त और गोदी मीडिया अब “हिंदी–चीनी भाई भाई” का नारा लगाते हुए चीनी झालर और छोटी आँख वाले गणेश जी खरीदने निकल पड़े।
ज़रा सोचिए, जिस चीन ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की खुलेआम पीठ थपथपाई, उसी चीन से दोस्ती के गीत गाए जा रहे हैं। विरोधियों को भी इससे अच्छा मसाला और क्या चाहिए? टीवी डिबेट में अब यह नया राग गाया जा रहा है—”चीनी समोसा खाओ, पर हिंदी चीनी भाई भाई नीति को मत भुलाओ।” कल तक ‘चीनी सामान का बहिष्कार’ का बिगुल बजाकर भक्तमंडली दीये जलाने निकली थी। “स्वदेशी अपनाओ” का नारा लगाया था।आज वही भक्त चीनी झालर खरीद रहे हैं, और छोटी आँखों वाले गणेश जी को घर ले आ रहे हैं। जिस चीन ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान का खुलेआम साथ दिया, उसी चीन के सामान से आज राष्ट्रभक्ति सजाई जा रही है। यह कैसा राष्ट्रवाद है?
हकीकत यह है कि “स्वदेशीकरण” का झुनझुना बजाते-बजाते अचानक सबको याद आ गया कि अगर सच में चीन से व्यापार बंद कर दिया तो अपने ही कारखानों की चिमनियाँ ठंडी हो जाएंगी। मशीनें चीन से, कच्चा माल चीन से, मोबाइल चीन से—यहाँ तक कि “Boycott China” लिखे हुए बैनर की छपाई वाली स्याही तक शायद चीन से ही आई होगी। क्या स्वदेशीकरण सिर्फ मिट्टी के दीयों तक सीमित है या फिर आत्मनिर्भरता की असली कुंजी भी Made in China है?”
और रही बात रूस की, तो वहाँ भी भक्त और गोदी मीडिया का गणित गड़बड़ा जाता है। कल तक यह कहा जा रहा था कि रूस भारत का “ट्रू फ्रेंड” है, लेकिन जैसे ही ट्रंप या पुतिन की मीटिंग में पाकिस्तान का जिक्र होता है, हमारे भक्तमंडल को घबराहट का दौरा पड़ने लगता है।
अजीब हालात हैं—
विरोधी सोच में हैं कि सरकार को कोसें या चीन की झालर जलाकर विरोध करें।
भक्त उलझन में हैं कि ट्रंप को “माई फ्रेंड” कहें या “बेवफ़ा सैयां”। और गोदी मीडिया तो हर प्राइम टाइम पर नए गाने का ट्रैक चुन रही है—आज “दोस्ती” वाला, कल “बेवफ़ाई” वाला।
उधर विश्वगुरु जी अभी भी मौन हैं, शायद इसलिए कि उन्हें मालूम है—”जिस देश की आत्मनिर्भरता चीन की झालरों और ट्रंप के मूड पर टिकी हो, वहाँ व्यंग्य खुद-ब-खुद आत्मनिर्भर हो जाता है।”
( राजीव खरे- चीनी और स्वदेशी के बीच में फँसा एक नागरिक कि दीवाली में चीनी झालर लाऊँ कि मिट्टी के दीये )

