भारत की ऊर्जा नीति अब किताबों में नहीं, टैंकरों में लिखी जा रही है — और स्याही की जगह रूसी कच्चा तेल इस्तेमाल हो रहा है। कहा गया था कि यह “राष्ट्रहित” का सौदा है, मगर पेट्रोल पंप पर अब भी वही पुराना रेट दिखता है — सिर्फ़ भाव बदल गया है, भावना नहीं।
जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ तो सरकार ने ड्रम बजाकर घोषणा की — “हम सस्ता तेल खरीदेंगेताकि जनता को राहत मिले।” जनता ने ताली बजाई, लेकिन बाद में पता चला कि राहत का यह टैंकर किसी और बंदरगाह पर उतर गया था — नाम था कॉर्पोरेट टर्मिनल।
सरकारी सूत्रों ने बताया कि यह सौदा जनता के हित में था। जनता ने भी मान लिया — क्योंकि जनता हर बात मानने के लिए प्रशिक्षित होती है। पर जब पेट्रोल-डीज़ल के दाम नहीं घटे, तो कुछ भोले लोग पूछ बैठे — “भई, सस्ता तेल आया तो गया कहां?” उत्तर मिला — “राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, सब कुछ नहीं बताया जा सकता।” अब सवाल यह है कि क्या “राष्ट्रीय सुरक्षा” का मतलब अब “कॉर्पोरेट गोपनीयता” हो गया है?
तेल की राजनीति और मुनाफे का भूगोल
रूस से तेल आया, भारत ने खरीदा, भारत की कंपनियों ने रिफाइन किया, और फिर वही तेल यूरोप चला गया — “रूस से परहेज़” करने वाले देशों को।

यानी तेल ने वह कर दिखाया जो कूटनीति नहीं कर पाई — “पश्चिम और रूस दोनों को जोड़दिया।”
पर इस चक्कर में भारतीय उपभोक्ता वहीं का वहीं रह गया — महंगाई के मोर्चे पर टैंक खाली और जेब की रिफाइनरी सूनी।
सरकारी दलील यह कि “हमने सस्ते में खरीदा।” कॉर्पोरेट जवाब यह कि “हमने लाभ से राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ाई।” जनता का अनुभव यह कि “हमने सिर्फ़ बिल बढ़ते देखे।”
ट्रंप की ट्रम्पेट और भारतीय प्रतिक्रिया
फिर मंच पर आए अमेरिका के वृद्ध योद्धा — डोनाल्ड ट्रंप। बोले, “भारत रूस को अमीर बना रहाहै, और अपने उद्योगपतियों को और अमीर।” हमारे प्रवक्ताओं ने जवाब दिया — “यह राष्ट्रहित में है।”लगता है “राष्ट्रहित” अब एक ऐसा बहुउपयोगी शब्द बन गया है जो हर नीति, हर सौदे, हर रहस्य की ढाल बन सकता है। अगर कल कोई कह दे कि “मुनाफा बढ़ाना राष्ट्रहित में है”, तो कौन तर्क करेगा?
राष्ट्रीय रणनीति या व्यवसायिक कूटनीति?
भारत अब दो मोर्चों पर युद्ध लड़ रहा है — एक यूक्रेन की राजनीति में और दूसरा अपने ही पेट्रोल पंप पर।
एक तरफ रूस से दोस्ती निभानी है, दूसरी ओर अमेरिका को नाराज़ नहीं करना है, और तीसरी ओर जनता को यह महसूस कराना है कि सब उसके लिए ही किया जा रहा है।
असल में यह संतुलन नहीं, एक कॉर्पोरेट करतब है — जिसमें रस्सी पर राष्ट्रहित चलता है और नीचे मुनाफे का जाल तना है।
तेल के पीछे की असली ऊर्जा
यह ऊर्जा नीति नहीं, एनर्जी बिज़नेस है। जहाँ नीति फाइलों में और नफा बैलेंस शीट में लिखा जाता है। जहाँ प्रधानमंत्री “विकास” की बात करते हैं और उद्योगपति “वितरण” की। जहाँ जनता को बताया जाता है कि “आपके लिए सस्ता तेल खरीदा गया,”और फिर वही जनता 110 रुपये लीटर में पेट्रोल लेकर ऑफिस जाती है — ताकि वही उद्योगपति, जिनके लिए तेल खरीदा गया था, उनके शेयरों की कीमत बढ़ा सके।
राष्ट्रहित की रिफाइनिंग
तेल की असली रिफाइनिंग अब रिफाइनरी में नहीं, नैरेटिव में होती है। जहाँ “सस्ते तेल” को “कूटनीतिक सफलता” कहा जाता है,और जनता की जिज्ञासा को “विपक्ष की साजिश” बताया जाता है।
अगर कभी पारदर्शिता का टैंकर सच में पहुंचे, तो शायद हमें पता चले कि “राष्ट्रहित” नाम का ईंधन अब कॉर्पोरेट ब्रांड” में तब्दील हो गया है और राष्ट्रहित की कीमत पेट्रोल पंप पर तय होते ही सस्ता तेल भी महंगा मिल रहा है।”
( एक व्यंग्यकार जो गाड़ी में सस्ता तेल भरवाने के ख़्वाब देखता हुआ पैदल चलने लगा है)

