खाद का संकट और किसानों की टूटी उम्मीदे
किसानों को लेकर मंचों पर भाषण देना आसान है, पर खेतों की वास्तविकता से आँखें चुराना उतना ही सरल बना दिया गया है। प्रधानमंत्री ने हाल ही में गर्व से कहा था कि अब किसानों को खाद के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ता। मगर हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ से लेकर राजस्थान और तेलंगाना तक किसान खाद की बोरी के लिए जूझ रहे हैं। सक्ती जिले के मालखरौदा–जैजैपुर मार्ग पर हाल में हुआ चक्काजाम सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में पनप रही किसान असंतोष की तस्वीर है।

सक्ती जिले के किसानों ने कई दिन पहले प्रशासन को चेतावनी दी थी कि अगर खाद उपलब्ध नहीं कराई गई तो वे आंदोलन करेंगे। ज्ञापन सौंपे गए, निवेदन किए गए, लेकिन नतीजा वही—किसानों को सड़क पर उतरना पड़ा। किसानों का आरोप साफ है कि समय पर खाद न मिलने से उनकी मेहनत और फसल दोनों पर संकट गहराता जा रहा है। यूरिया और डीएपी जैसे बेसिक इनपुट के बिना न तो उपज का स्तर ठीक रह पाएगा और न ही गुणवत्ता। यह नुकसान केवल खेत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बाजार में महंगाई और खाद्य सुरक्षा तक असर डालेगा।
दूसरे राज्यों का हाल भी इससे अलग नहीं है। राजस्थान के कई जिलों में किसानों को डीएपी लेने के लिए अतिरिक्त सामान खरीदने पर मजबूर किया जा रहा है। तेलंगाना में आवंटन और आपूर्ति के बीच का फासला इतना बड़ा है कि 9.80 लाख मीट्रिक टन के वादे के बावजूद मुश्किल से आधी आपूर्ति हुई। उत्तर प्रदेश में सरकार ‘पर्याप्त उपलब्धता’ का दावा करती है, लेकिन किसानों की कतारें उसकी पोल खोल देती हैं। छत्तीसगढ़ विधानसभा में तो खाद संकट पर इतना हंगामा हुआ कि 30 विपक्षी विधायकों को निलंबित करना पड़ा।
सरकार अपनी ओर से रिपोर्ट देती है कि अंतरराष्ट्रीय साझेदारी, घरेलू उत्पादन और सब्सिडी के दम पर खाद का स्टॉक “आरामदायक स्तर” पर है। चीन से आयात में ढील, मोरक्को और सऊदी अरब से समझौते—ये सब कदम कागज पर भले ही भरोसा जगाते हों, लेकिन ज़मीन पर हालात अलग कहानी कहते हैं। अगर सब कुछ इतना दुरुस्त है तो किसानों की सड़कें क्यों जाम हो रही हैं?
असल समस्या आपूर्ति श्रृंखला और पारदर्शिता की है। खाद का आवंटन भले ही कागज पर तय हो जाए, लेकिन डिपो तक आते-आते उसका वितरण राजनीति, अफसरशाही और दलालों के जाल में उलझ जाता है। ग्रामीण सहकारी समितियाँ किसानों के बजाय चुने हुए वर्गों को प्राथमिकता देती हैं, और जब तक किसान की बारी आती है, गोदाम खाली हो चुके होते हैं।
यह भी ध्यान रखना होगा कि किसान के लिए खाद केवल “इनपुट” नहीं है—यह उसकी साल भर की मेहनत का आधार है। बोवाई के समय अगर खाद नहीं मिला तो बाद में कोई भी सरकारी राहत उसकी भरपाई नहीं कर सकती। यह स्थिति वैसी ही है जैसे किसी मरीज़ को ऑपरेशन के वक्त खून न मिले और बाद में उसे सांत्वना दी जाए कि “सरकार ने पर्याप्त खून का इंतज़ाम कर रखा है।”
आज ज़रूरत है कि सरकारें केवल आंकड़ों और घोषणाओं तक सीमित न रहें। किसानों को राहत देने के लिए तीन स्तर पर काम होना चाहिए—
1. वास्तविक समय निगरानी: खाद की उपलब्धता और वितरण का डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम पंचायत स्तर तक हो।
2. कड़ी जवाबदेही: जिस जिले में कमी दिखे, वहाँ के जिम्मेदार अफसर और सहकारी समिति को सीधे जवाबदेह ठहराया जाए।
3. भरोसे की बहाली: किसानों को लाइन और ब्लैक मार्केट से बचाने के लिए उचित मूल्य पर सीधा वितरण मॉडल लागू किया जाए।
भारत की कृषि नीति केवल सब्सिडी और चुनावी वादों पर नहीं टिक सकती। खेतों की ज़रूरतें वक्त पर पूरी करना ही सबसे बड़ी किसान–नीति है। किसानों को भरोसा दिलाने का वक्त अब निकल चुका है। अगर खाद की एक बोरी के लिए उन्हें सड़क पर उतरना पड़े, तो यह केवल प्रशासन की विफलता नहीं, बल्कि देश की कृषि नीति की असल तस्वीर है।
( राजीव खरे- चीफ एडिटर )

