अलास्का का सबक: शक्ति के खेल और भारत की अर्थनीति पर असर
अलास्का के ठंडे मैदानों में जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आमने-सामने बैठे, तो पूरी दुनिया की तरह भारत ने भी इस वार्ता पर गहरी नज़र रखी। बैठक बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई, लेकिन यह चर्चा भारत की अर्थनीति और कूटनीति दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी।
अलास्का क्यों चुना गया?
इस मुलाकात का मंच अलास्का इसलिए था क्योंकि यह वह भूभाग है जिसे 1867 में रूस से अमेरिका ने 7.2 मिलियन डॉलर में खरीदा था। तब इसे व्यर्थ भूमि माना गया, लेकिन बाद में यह अमेरिका की ऊर्जा और रणनीतिक सुरक्षा का आधार बना। अलास्का का चुनाव महज़ भौगोलिक नज़दीकी (रूस और अमेरिका के बीच बेरिंग जलडमरूमध्य मात्र 55 मील) नहीं था, बल्कि यह दोनों महाशक्तियों के ऐतिहासिक और रणनीतिक रिश्तों का प्रतीक भी था।
भारत के लिए यह वार्ता क्यों अहम थी?
भारत की अर्थनीति वैश्विक ऊर्जा बाज़ार, हथियार सौदों और भू-राजनीतिक स्थिरता पर निर्भर करती है। यूक्रेन युद्ध के चलते तेल-गैस की कीमतें बढ़ीं, अनाज आपूर्ति प्रभावित हुई, और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों ने रूस के साथ व्यापार कठिन बना दिया। अलास्का में यदि कोई समझौता होता, तो उसके प्रभाव सीधे भारत तक पहुँचते।
अगर ट्रम्प की बातें मानी जातीं
ऊर्जा बाज़ार: ट्रम्प यूक्रेन के पक्ष में सख्त रुख लेकर रूस पर और कठोर आर्थिक दबाव डालना चाहते थे। अगर उनकी लाइन चलती तो कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ जातीं। भारत, जो अपनी ज़रूरत का लगभग 85% तेल आयात करता है, महंगे आयात से भारी दबाव में आ जाता।
रक्षा सौदे: अमेरिका रूस से हथियार खरीदने वाले देशों पर प्रतिबंध (CAATSA) और सख्ती और बढ़ा सकता था। भारत रूस से सुखोई, एस-400 जैसे हथियार लेता है—ऐसे में यह सौदे अटक सकते थे।
डॉलर निर्भरता: अमेरिकी दबाव बढ़ने पर भारत को अंतरराष्ट्रीय भुगतान डॉलर में ही करना पड़ता, जिससे रुपया और कमजोर हो सकता था।
अगर पुतिन की बातें मानी जातीं
ऊर्जा सुरक्षा: पुतिन की मांग होती कि रूस पर से प्रतिबंध हटाए जाएं। यदि ऐसा होता तो भारत को रूस से सस्ता तेल और गैस मिलता, और ऊर्जा आयात बिल कम होता।
रक्षा सहयोग: रूस से भारत की दीर्घकालिक रक्षा साझेदारी और मजबूत होती। अमेरिका और यूरोप की जगह भारत रूस पर और ज्यादा निर्भर हो जाता।
भुगतान तंत्र: भारत-रूस के बीच रुपया-रूबल तंत्र को और बढ़ावा मिलता, जिससे डॉलर निर्भरता घटती। यह भारत की मुद्रा स्थिरता के लिए दीर्घकालिक लाभकारी होता।
लेकिन खतरे भी
अगर ट्रम्प की नीति लागू होती, तो भारत की आर्थिक मजबूरियाँ बढ़तीं। अगर पुतिन की लाइन पूरी तरह मान ली जाती, तो भारत पश्चिमी देशों की नज़रों में संदेह के घेरे में आ जाता। निवेश और तकनीक सहयोग में बाधा आती।
अलास्का की बैठक भले ही बिना नतीजे खत्म हो गई, लेकिन यह भारत जैसे देशों के लिए गहरी सीख छोड़ गई। भारत को हर हाल में संतुलनकारी कूटनीति अपनानी होगी—जहाँ अमेरिका और पश्चिम के साथ तकनीक व निवेश संबंध कायम रहें, वहीं रूस से ऊर्जा और रक्षा सहयोग भी सुरक्षित रहे।
भारतीय प्रवासियों के लिए भी यह संदेश है कि वे जिस देश में रहते हैं, वहां की नीतियों में शांति और संवाद का समर्थन करें, क्योंकि वैश्विक शक्ति संतुलन का असर उनकी ज़िंदगी और भारत की अर्थनीति पर सीधे पड़ता है।
(राजीव खरे- ब्यूरो चीफ छत्तीसगढ़)

