
चाकू की धार पर छत्तीसगढ़
धमतरी जिले की एक शांत रात, अचानक खून और चीखों से भर गई। एक ढाबे में मामूली विवाद पर आठ युवकों ने तीन युवाओं को चाकू से गोदकर मौत के घाट उतार दिया। आरोपियों में तीन नाबालिग थे। घटना की भयावहता यहीं खत्म नहीं होती—इन बेखौफ अपराधियों ने हत्या के बाद शवों के साथ फोटो खिंचवाई और विजयी मुद्रा में सोशल मीडिया पर डाली। यह सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि समाज और कानून व्यवस्था के लिए खुली चुनौती है।
राज्य में यह पहला मामला नहीं। बीते महीनों में रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, कोरबा, धमतरी—लगभग हर जिले से चाकूबाजी की खबरें आ रही हैं। इनमें से अधिकतर में दो बातें समान दिखती हैं—एक, आरोपी पहले से बड़े अपराधी नहीं होते, बल्कि मामूली झगड़ों में अचानक हथियार उठा लेते हैं; और दूसरी, अपराध से पहले या दौरान नशे में होते हैं। यह साफ संकेत है कि नशे और हिंसा का घातक मेल युवाओं को असमय अपराध की राह पर धकेल रहा है।
और भी चिंताजनक पहलू है—अपराध में नाबालिगों की बढ़ती भागीदारी। ये किशोर, जो भविष्य के निर्माता होने चाहिए, मामूली उकसावे में जान लेने से भी पीछे नहीं हटते। परिवार और समाज के नियंत्रण तंत्र में आई ढिलाई, डिजिटल दुनिया का नकारात्मक असर, और नशे की आसान उपलब्धता ने इस स्थिति को और बिगाड़ दिया है।
सोशल मीडिया ने अपराधियों को नया मंच दे दिया है। अब वे सिर्फ अपराध करके संतुष्ट नहीं होते, बल्कि उसे दिखावा और ग्लैमर का रूप देकर अपनी ‘बहादुरी’ का प्रचार करते हैं। यह प्रवृत्ति नए युवाओं को प्रभावित करती है, और अपराध को एक ‘स्टेटस सिंबल’ की तरह पेश करती है—जो बेहद खतरनाक है।
कानून व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लगातार बढ़ते अपराध यह दर्शाते हैं कि गश्त, खुफिया तंत्र और समय पर रोकथाम में खामियां हैं। हालांकि पुलिस द्वारा नशा विरोधी और अपराध नियंत्रण के लिए अभियान चलाए गए हैं, लेकिन उनका असर टिकाऊ और व्यापक होना जरूरी है। जब तक अवैध शराब और नशे के कारोबार पर सख्त, निरंतर कार्रवाई नहीं होगी, और समाज के हर स्तर पर जागरूकता नहीं फैलाई जाएगी—तब तक ऐसे हादसों में कमी आना मुश्किल है।
यह समय केवल पुलिस या प्रशासन को जिम्मेदार ठहराने का नहीं, बल्कि पूरे समाज को एकजुट होकर जवाब देने का है। परिवारों को अपने बच्चों की संगत और मानसिक स्थिति पर ध्यान देना होगा; स्कूलों को अनुशासन और नैतिक शिक्षा पर जोर देना होगा; और समुदाय को नशा-मुक्ति व हिंसा-रोधी माहौल बनाने में सक्रिय भाग लेना होगा।
धमतरी की यह घटना सिर्फ तीन जिंदगियों का अंत नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—अगर अब भी हम नहीं चेते, तो आने वाले कल में यह धार किसी का भी गला चीर सकती है।
( राजीव खरे चीफ एडिटर)
