
‾बंदर के हाथ में उस्तरा — ट्रंप की टैरिफ़ राजनीति और भारत का धैर्य परीक्षण
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जिनमें हास्य और चिंता दोनों का अनोखा संगम होता है। डोनाल्ड ट्रंप का हालिया बयान भी इसी श्रेणी में आता है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति और इस साल फिर से व्हाइट हाउस की दौड़ में शामिल ट्रंप ने भारत को चेतावनी दी है कि अगर उसने रूस से तेल ख़रीदना जारी रखा, तो उस पर “अकल्पनीय” टैरिफ़ थोप दिए जाएंगे।
यह चेतावनी सुनकर सबसे पहले हंसी आती है, क्योंकि अमेरिका ख़ुद रूस से व्यापार करता है — चाहे वह उर्वरक हो, परिष्कृत यूरेनियम हो , ऊर्जा हो या अन्य आवश्यक वस्तुएँ। यूरोप और नाटो के बड़े-बड़े नेता, जो हर मंच पर रूस विरोध का झंडा उठाते हैं, पर्दे के पीछे वही रूस से गैस और तेल ख़रीदते हैं। लेकिन भारत पर डंडा चलाने की धमकी? यह वही पुरानी “दुनिया मेरे हिसाब से चले” वाली मानसिकता है, जो अमेरिका के कुछ नेताओं के डीएनए में बसी है।
ट्रंप की यह बयानबाज़ी किसी कूटनीतिक रणनीति से ज़्यादा चुनावी स्टंट लगती है। जैसे हरिशंकर परसाई ने लिखा था — “राजनीति में कुछ लोग मुद्दा नहीं देखते, बस मौका देखते हैं।” यहाँ मुद्दा रूस है, लेकिन मौका भारत को दबाने का।
मज़ेदार यह है कि ट्रंप के हालिया रवैये से यही आभास होता है कि नीतियों में स्थिरता और बयानों में तारतम्य अब उनकी डिक्शनरी में नहीं। पर परेशानी का कारण यह है कि जब बंदर के हाथ में उस्तरा पकड़ा दिया जाए, तो वह अपने बाल काटेगा या सामने वाले का गला — इसकी कोई गारंटी नहीं।
भारत के लिए यह स्थिति एक कूटनीतिक चुनौती है। एक तरफ़ रूस हमारा दशकों पुराना रक्षा और ऊर्जा सहयोगी है, तो दूसरी तरफ़ अमेरिका, जिसके साथ व्यापार और तकनीकी साझेदारी बढ़ाना भी उतना ही ज़रूरी है। लेकिन किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के लिए यह स्वीकार करना संभव नहीं कि कोई उसे बताए कि वह किससे तेल खरीदे और किससे नहीं।
ट्रंप के इस बयान का दूसरा पहलू यह है कि यह केवल भारत को नहीं, बल्कि अन्य “ग़ैर-पश्चिमी” देशों को भी संदेश है — अमेरिका के रास्ते पर चलो, वरना व्यापार के रास्ते बंद कर देंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि दबाव और धमकी से भारत न तो पहले झुका है, न अब झुकेगा।
इधर, रूस और चीन को भी ट्रंप की बातें सुनकर कोई फर्क नहीं पड़ा। वे अमेरिकी धमकियों को “नहीं सुन रहे हैं” — यानी न सुनने की आदत बना चुके हैं। रूस अपनी ऊर्जा डील्स एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में धड़ल्ले से बढ़ा रहा है, जबकि चीन अमेरिकी आर्थिक घेराबंदी को चकमा देने के नए रास्ते निकाल रहा है।
ट्रंप की समस्या यह है कि उनकी विश्व दृष्टि “अमेरिका फर्स्ट” के नाम पर “बाकी सब लास्ट” में बदल चुकी है। और यही कारण है कि आज उनकी धमकियों को लोग गंभीरता से कम, और चुनावी शोपीस के तौर पर ज़्यादा देखते हैं। जैसा कि शरद जोशी ने तंज़ कसते हुए कहा था — “कुछ लोग इतने बड़े हो जाते हैं कि फिर उन्हें छोटा होने में ही मज़ा आता है।”
अंत में, अंतरराष्ट्रीय राजनीति की इस कॉमेडी में एक सच्चाई छिपी है — बड़े राष्ट्र भी जब व्यक्तिगत अहंकार और चुनावी लाभ के लिए बोलते हैं, तो वे किसी व्यंग्य-नाटक के पात्र से ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिए जा सकते। फर्क बस इतना है कि यहाँ कटने वाले बाल नहीं, बल्कि वैश्विक रिश्ते होते हैं।
( राजीव खरे- चीफ एडीटर)
