पीओके लेने के खोखले दावे अब रोमांचित नहीं करते- जनता को सपने नहीं, समाधान चाहिये
कुछ दिनों पहले संसद में देश के गर्जना मंत्री साहब ने ऐलान कर भाजपा पीओके लेगी। बात सुनते ही देश के एक हिस्से में तालियाँ बजीं, और दूसरे हिस्से में गैस सिलेंडर के दाम की याद आई। अब भैया, पहली बात तो ये कि सबसे पहले स्पष्ट कर दिया जाए कि भाजपा कोई संप्रभु राष्ट्र नहीं है, न ही उसकी कोई सेना है। भाजपा के पास सोशल मीडिया की एक अतिविश्वासी ब्रिगेड है, जो मीम और जुमलों का युद्ध लड़ती है और कमेंट सेक्शन में युद्ध जीत लेती है और ट्वीट से परमाणु बम फोड़ देती है। गोदी मीडिया की भी पूरे निष्ठा से सुर में सुर मिलाता है सुबह चाय पीते-पीते बलूचिस्तान और शाम को पकौड़े खाते- खाते पाकिस्तान जीत लेंगे! इस तरह के बयान, भले ही तालियाँ बटोरने के लिए हों, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों को हल्के में लेने की आदत का प्रतीक बन चुके हैं। ये बयान अब हास्यास्पद लगते हैं क्योंकि देश की आंतरिक चुनौतियाँ खुद बेकाबू हो रही हैं।
साहब, ज़रा नक्शा खोलिए — पीओके में चीन की बटालियनें तैनात हैं। बलूचिस्तान में भी ड्रैगन की पूंछ लहराई जा रही है। और ऊपर से ट्रंप और जिन पिंग पाकिस्तान को गोद में झुला झुला रहे हैं। अब इनसे लड़ने की बात तो छोड़िए, इनके खिलाफ ट्वीट भी कर पाएं, इतना कलेजा तो बचा ही नहीं है। सत्तर साल, सत्तर साल रटते-रटते अब खुद के ग्यारह साल को आइना दिखाने का वक्त आ गया है। महंगाई के रॉकेट पर बैठा आम आदमी अब पूछ रहा है — पीओके छोड़िए, प्याज़ सस्ता क्यों नहीं मिल रहा?” देश में बेरोजगारी नई ऊँचाइयाँ छू रही है, लेकिन इनकी रैलियों में शब्दों का ऐसा आतिशबाज़ी शो चलता है कि लगता है देश अब AI से नहीं, HI-HI से चलेगा। आंतरिक सुरक्षा की हालत यह है कि देश के कई हिस्सों में कानून-व्यवस्था नाममात्र की रह गई है। देश में कानून व्यवस्था का आलम यह है कि सड़क पर उतरते ही नागरिक की सुरक्षा भगवान भरोसे है।आतंकवाद फिर से सिर उठाने लगा है, और वह मंत्रालय जिसे इसकी जिम्मेदारी दी गई है, वो फिलहाल चुनावी सभाओं में व्यस्त है। इसके मुखिया जनता को सपने बेच दिन-रात रैलियों में गरजने में व्यस्त हैं। देश की हालत यह है कि कानून व्यवस्था गिरते-गिरते पुलिसवालों को ही अपनी सुरक्षा की ज़रूरत पड़ने लगी है।
अर्थव्यवस्था पर सुनहरी परत चढ़ाकर उसे चौथे नंबर की शक्ति कहा जा रहा है। लेकिन आम आदमी की थाली में सब्ज़ी की जगह अब सिर्फ चिंता परोसी जा रही है। “अगर हम विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुके हैं, तो फिर हमारी थाली इतनी खाली क्यों है?” रुपया इतना नीचे जा चुका है कि अब अफ़ग़ानिस्तान की करेंसी भी हमसे ऊपर है। विदेशों में बड़े-बड़े ईवेंट करवा कर ‘विश्वगुरु’ बनने के नारे बुलंद किए जाते हैं, और जनता को हसीन सपनों में उलझाने की कोशिश की जाती है, पर दाल-चावल की कीमतें ही उन्हें नींद से जगा देती हैं। देश के युवाओं को नौकरी नहीं, नौटंकी नसीब हो रही है। लेकिन अब लोग धीरे-धीरे समझने लगे हैं कि शेर बनकर मंच पर दहाड़ने और घरों में दूध-दाल का खर्च उठाने में कितना अंतर है। देश चलाना TV डिबेट, ईवेंट और एजेंसियों से नहीं होता, कभी गरीब की थाली में जाकर भी झाँक लीजिए।
इस सबके बीच मीडिया का बड़ा हिस्सा अब “सत्ता का डेस्क” बन चुका है — जो न सवाल पूछता है, न जवाब चाहता है। और जो थोड़े बहुत पत्रकार सवाल पूछते हैं, उनके पीछे एजेंसियों की सेना लगा दी जाती है। देश चलाने की परिभाषा अब बदल चुकी है — चैनलों पर बहस जिताइए, एजेंसियों से दबाव बनवाइए, और जो न माने उसे देशद्रोही बताइए। देश का हर सवाल अब राष्ट्रद्रोह माना जा रहा है, और हर आलोचना पर FIR तैयार रहती है।
“आलोचना की आज़ादी” अब बस संविधान की किताबों तक सीमित रह गई है। जो पत्रकार सत्ता से असहमत दिखते हैं, उनके पीछे तीन-तीन एजेंसियाँ लगा दी जाती हैं। लोकतंत्र की जगह अब डर तंत्र पनप रहा है, और लोगों का ध्यान बंटाने के लिये इंदिरा जी की एमरजेंसी की फिल्म दिखाई जा रही है। ट्रंप की एक घुड़की में ही सीजफायर हो जाता है, फिर टीवी पर बताया जाता है पाकिस्तान के गिडगिडाने पर हमने उसको माफ कर दिया। लेकिन इनसे सवाल पूछिए तो तीन-तीन ‘जवाईं’ (जाँच एजेंसियाँ) पीछा करने लगती हैं।
अब तो चुनाव आयोग तक पर उंगलियाँ उठने लगी हैं चुनाव आयोग को भी खुलेआम ‘फ्री हैंड’ दे दिया गया है —”न चूकने पाए कोई चुनाव, जो हमारे पक्ष में न हो!” उसे खुली छूट दी गई है कि चुनाव कुछ भी हो, परिणाम “समझदारी” से आएं! वरना महाराष्ट्र हाथ से फिसल जाता, हरियाणा और दिल्ली भी शायद बच न पाते। पाते विपक्ष चुनाव आयोग पर वोटर लिस्ट में बेईमानी के खुले आरोप लगा रहा है, पर मानना पडेगा चुनाव आयोग को जो ,सुप्रीम कोर्ट की लताड के बाद भी सत्तारूढ दल की मदद करने में जी जान से लगा है।
इधर अनुशासित कहे जाने वाले सत्तारूढ दल में भी पद के लिये असंतोष और आपसी खींचतान मचने के संकेत दिखने लगे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, उप राष्ट्रपति और यदि सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री तक की कुर्सी के लिये दावेदारों के नाम उछाले जा रहे हैं। संघ भी बीच-बीच में 75 वर्ष की आयु के बाद रिटायरमेंट की सुरसुरी छोड कर यूट्यूबरों को मसाला दे देता है।
भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, धार्मिक विद्वेश और अपराध चरम पर है, चीफ विदेश यात्रा में ऐसे लगे हैं कि 75 के होने के पहले कोई देश घूमने से रह न जाए। विदेश यात्राओं और वहां ईवेंट आर्गनाइज करने की विदेश नीति में अरबों रुपये स्वाहा होने के बाद भी कोई देश साथ नहीं खडा है। हालत ये है कि विदेशी नेता अब जबरदस्ती के गले लगने और बार बार हाथ मिलाने की आदत से चिढने लगे हैं। ताजा य़ूके दौरे के फुटेज में यह साफ देखा जा सकता है। अपनी हर अकर्यमण्यता और गलती के लिये बस सत्तर साल और नेहरू के नाम से बिल फाडे जाते हैं। प्रतियोगिता परीक्षाओं की विश्वसनीयता खतम हो चुकी है। पर इसके खिलाफ आंदोलन पर जो बल प्रयोग होता हे वो जनरल डायर की याद दिलाता है। पर सवाल पूछते ही आप गद्दार करार कर दिये जाते हैं। TV खोलते ही एंकर चिल्लाते हैं — “देखिए, कैसे भारत इतिहास बना रहा है!” इतिहास सच में बन रहा है साहब — लेकिन किताबों में नहीं, भ्रष्टाचार के कोर्ट केसों में।
तो नेताजी, सुझाव बस इतना है पहले देश की अर्थव्यवस्था को ICU से बाहर लाइए। “देश को भाषणों से नहीं, योजनाओं से चलाइए। जनता को सपनों से नहीं, समाधान से जीतिए। देश को वास्तव में मज़बूत बनाना है तो पहले जनता की आवाज़ को सुनिए, पीओके पर लफ्फाजी बंद कीजिए, पहले हिमालय के इस पार संभालिये फिर उस पार की सोचिये। जन-विश्वास बटोरने का सबसे सच्चा रास्ता थाली में रोटी देना है, न कि TV में भाषण देना। इन हालात में पीओकेकी फतह के सपने दिखाना शायद सिर्फ जनता का ध्यान भटकाने की कवायद है। देश की असली ज़रूरत है -रोटी, रोजगार और शांति, ना कि राष्ट्रवाद के नाम पर जुमलों की गूँज।
(राजीव खरे- चीफ एडीटर)

