
“कोसो” यही है असली कोचिंग!”
भारतीय क्रिकेट टीम ने इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला ड्रॉ कर ली — लेकिन असली जीत मैदान में नहीं, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर गालियों की झड़ी लगाने वाली जनता की हुई। जी हां, वही जनता जो मैच के साथ-साथ खिलाड़ियों की माँ-बहन भी याद करवा देती है।
इस श्रृंखला ने एक नायाब फॉर्मूला पेश किया — “जिसे गरियाओ, वही चमकेगा!” अगर ये बात किसी खेल यूनिवर्सिटी में थीसिस के रूप में पेश कर दी जाए तो पीएचडी के साथ-साथ IPL की कोचिंग की सीट भी पक्की मानी जाएगी ।
श्रृंखला की शुरुआत हुई शुभमन गिल के “मॉडल फेस” से। दौरे के ठीक पहले आईपीएल में उनका बल्ला उतना चल नहीं रहा था तो पब्लिक को कोसते ही वो टेस्ट में ऐसे बल्ला घुमाने लगे उन्होंने शतक ठोक दिये। और जब लोगों ने उनकी बैटिंग की तारीफ़ करनी शुरू कर दी तो वह आख़िरी मैच में फुस्स हो गए । फिर जब उनकी कप्तानी को लोगों ने ट्रोल करना शुरू किया तो हार को जीत कर वो बाज़ीगर बन गए । यह देखकर बोर्ड को तो नहीं पर ट्विटर यूजर्स को जरूर गर्व हुआ — “हमारी गाली रंग लाई!”
फिर आए मोहम्मद सिराज, जो पहले मैचों तक गेंद को ऐसे फेंक रहे थे जैसे किसी मेले में गोलियां चल रही हों — इधर-उधर, अंधाधुंध। लेकिन अंतिम टेस्ट में जैसे ही लोगों ने कहा, “सिराज अब सिर्फ एड शूट में ही अच्छे लगते हैं,” वैसे ही वो विकटें उखाड़ने लगे जैसे सब्जी वाला पत्तागोभी उखाड़ता है।
आकाश दीप भी इसी योजना पर चले। पहले मैच तक इनकी गेंदें ज़मीन से ज्यादा बल्लेबाजों के दिल पर लग रही थीं। लेकिन जिस दिन “ये दो नंबर के बॉलर हैं” ट्रेंड करने लगा, अगले टेस्ट में विकेटों की लाइन लग गई। प्रसिद्ध कृष्णा ने भी तब तक विकेट नहीं लिये जबतक उन्हें लोगों ने ट्रोल नहीं किया।
यह देखकर चयनकर्ताओं और कोचिंग स्टाफ को समझ में आ गया कि नेट प्रैक्टिस से कुछ नहीं होता — असली कोचिंग है जनता की गरियाहट। अब टीम मैनेजमेंट एक नया विभाग खोलने पर विचार कर रहा है — “ऑनलाइन आलोचना एवं मनोबल प्रबंधन प्रकोष्ठ”, जिसमें गाली देने के लिए विशेषज्ञों की भर्ती होगी। आने वाले सीजन से पहले चयन शिविर नहीं, ट्विटर ट्रोलिंग कैम्प लगाया जाएगा।
अब क्रिकेट की किसी भी ट्रॉफी में जीत चाहिए? तो याद रखें:-
गेंदबाज़ को गरियाओ, वह गेंदबाज़ी करेगा!
– बैट्समैन को कोसो, वह रन बनाएगा!
– विकेटकीपर को ताने मारो, वो कैच पकड़ेगा!
अब वक्त आ गया है कि BCCI खिलाड़ियों की फिटनेस से ज्यादा उनकी “ट्रोलिंग रेसिस्टेंस” का टेस्ट ले। क्योंकि इस देश में फॉर्म गालियों से लौटता है, न कि फिटनेस कैंप से।
तो अगली बार जब भारतीय टीम मैदान में हो और आपका पसंदीदा खिलाड़ी फ्लॉप हो जाए, तो घबराइए मत — बस गरियाइए।
क्योंकि यहाँ “गाली देना” सिर्फ मनोरंजन नहीं, अब तो राष्ट्रीय कर्तव्य बन चुका है।
( राजीव खरे- ट्रोलिंग के सहारे क्रिकेट में वापसी की जुगाड़ में)
